रविवार, 6 सितंबर 2020

बोलो मैं कैसे बिकता

एक गजल तेरे होठों पर लिख सकता था
इसकी टपक रही लाली पर बिक सकता था

किंतु सामने जब शहीद की पीर पुकारे
जान वतन पर देने वाला वीर पुकारे
जिसने भाई, लाल, कंत कुर्बान किये हों
सूख चुकी उनकी आँखों का नीर पुकारे

कैसे उन क़ातिल मुस्कानों पर बिकता
कैसे कोमल नाजुक होठों पर लिखता


एक गजल तेरी आँखों पर लिख सकता था
चंचल चितवन सी कमान पर बिक सकता था

पर कौरव-पांडव दल आँखें मींच रहा हो
चीर दुःशासन द्रुपद-सुता की खीँच रहा हो
हाथ जोड़ कर कहीं दामिनी बिलख रही हो
और दरिंदा वहशी उसको भींच रहा हो 

तब बोलो कैसे आलिंगन पर बिकता
कैसे काजल वाली आँखों पर लिखता


एक गजल तेरे गालों पर लिख सकता था
हुस्न नजाकत नाज अदा पर बिक सकता था

किन्तु जहाँ नेता जनता को भरमाते हों
धर्मों का धंधा करने वाले भाते हों
सबके पेटों को भरने वाले जब खुद ही
घुटने डाल पेट में भूखे सो जाते हों

तुम बोलो मैं कैसे चुम्बन पर बिकता
कैसे डिम्पल वाले गालों पर लिखता


एक गजल तेरी चालों पर लिख सकता था
लटकन मटकन झटकन पर भी बिक सकता था

किन्तु जहाँ हलकू वादों पर ही जीता हो
आज तलक भी झूरी का दामन रीता हो
झूठे सत्ता की सीढ़ी चढ़ते जाते हों
सच्चा घूँट ज़हालत के कड़वे पीता हो

कैसे मदहोशी के स्पर्शों पर बिकता
कैसे हिरनी वाली चालों पर लिखता

आशीष यादव

शुक्रवार, 28 अगस्त 2020

तरही गजल

 221   2121   1221   212 


जिंदादिली से जब वो किसानी में आएगा 

खाने का लुत्फ़ दाल-मखानी में आएगा 


पाले कभी न तुमने मवेशी तो क्या पता 

गायों को स्वाद कौन से सानी में आएगा


किलकारियां दालान में गूँजेगीं जिस घड़ी 

"बचपन का दौर फिर से जवानी में आएगा" 


ठाकुर से जा मिले हैं कथाकार आजकल 

होरी कहाँ किसी की कहानी में आएगा 


ये क्या कि तूने पार की सूखी हुई नदी 

असली हुनर नदी की रवानी में आएगा 


माँ भारती के वास्ते कुरबाँ जो हो गए 

शेरों का अक्स उनकी निशानी में आएगा 


आशीष यादव

सोमवार, 24 अगस्त 2020

ये ज़िंदगी का हसीन लमहा

 (12122)×4

ये ज़िंदगी का हसीन लमहा

गुजर गया फिर तो क्या करोगी
जो जिंदगी के इधर खड़ा है

उधर गया फिर तो क्या करोगी

तुम्हें सँवरने का हक दिया है

वो कोई पत्थर का तो नहीं है
लगाये फिरती हो जिसको ठोकर

बिखर गया फिर तो क्या करोगी

कि जिनकी शाखों पे तो गुमां है

मगर उन्हीं की जड़ों से नफरत
वो आँधियों में उखड़ जड़ों से

शज़र गया फिर तो क्या करोगी

जिसे अनायास कोसती हो

छिपाए बैठा है पीर सारी
तुम्हारी नज़रों से गिर के आखिर

वो मर गया फिर तो क्या करोगी

किवाड़ दिल के लगा रखी हो

नज़र की खिड़की खुली हुई है
कोई निग़ाहों से सीधे दिल में

उतर गया फिर तो क्या करोगी

तू जिसकी उल्फ़त में जी रही है

कुछ उसकी नीयत भली नहीं है
वो खा के कसमें दिखा के सपने

मुकर गया फिर तो क्या करोगी

आशीष यादव

सोमवार, 10 अगस्त 2020

मगर हड़का रहा है

 उसकी ना है इतनी सी औकात मगर हड़का रहा है 

झूठे में ही खा जाएगा लात मगर हड़का रहा है 


औरों की बातों में आकर गाल बजाने वाला बच्चा 

जिसके टूटे ना हैं दुधिया दाँत मगर हड़का रहा है 


जिसके आधे खर्चे अपनी जेब कटाकर दे रहे हैं 

अबकी ढँग से खा जायेगा मात मगर हड़का रहा है 


आदर्शों मानवमूल्यों को छोड़ दिया तो राम जाने 

कितने बदतर होंगे फिर हालात मगर हड़का रहा है 


उल्फत की शमआ पर पर्दा डाल रहा है बदगुमानी 

कटना मुश्किल है नफरत की रात मगर हड़का रहा है 


आशीष यादव

गुरुवार, 6 अगस्त 2020

कइसे होई गंगा पार

जिनिगी भर बस पाप कमइला 
कइसे करबा गंगा पार 

जुलुम सहे के आदत सभके 
के थामी हाथे हथियार 

केहू नाही बनी सहाई 
बुझबा जब खुद के लाचार 

काम न करबा घिसुआ जइसे 
कहबा गंदा हव संसार 

गैर क बिटिया बहू निहारल 
हवे डुबावल धरम अपार 

जइसन करबा ओइसन भरबा 
करनी हव फल कै आधार 

पढ़ल कुबुद्धी के समझावल 
भीत से फोरल हवे कपार 

आशीष यादव

मंगलवार, 4 अगस्त 2020

मोहब्बत

जय व पराजय में देती जो सोहबत|

खुदा की है वो दस्तकारी मोहब्बत||

 

यही पंथ है नेक शान्ती का केवल|

मानवता को है सवांरी मोहब्बत||

 

मिल जुल के जो हमको रहना सिखाती|

बनी आज शिक्षक हमारी मोहब्बत||

 

मंजिल तक पहुचाये हमराह के संग|

इक सूत में बांधें प्यारी मोहब्बत||

 

बनिहारी कैसे हो सकती है इसमें|

किसी की नहीं काश्तकारी मोहब्बत||

 

नहीं तुम बचोगे नहीं हम बचेंगे|

अगर रो पड़ी जो लाचारी मोहब्बत||

 

संकल्प लें, एक तिल ना घटे ये|

हमारी मोहब्बत, तुम्हारी मोहब्बत||

सोमवार, 3 अगस्त 2020

उसने पी रखी है

वो न समझेगा हसद की बात उसने पी रखी है
सिर्फ़ होगी प्यार की बरसात उसने पी रखी है

होश में दुनिया सिवा अपने कहाँ कुछ सोचती है
कर रहा है वो सभी की बात उसने पी रखी है

मुँह पे कह देता है कुछ भी दिल में वो रखता नहीं है
वो समझ पाता नहीं हालात उसने पी रखी है

झूठ मक्कारी फ़रेबी ज़ुल्म का तूफ़ाँ खड़ा है
क्या वो सह पायेगा झंझावात? उसने पी रखी है

जबकि सब दौर-ए-जहाँ में लूटकर घर भर रहे हों
वो लुटाता चल रहा सौगात उसने पी रखी है

आखिरी वस्ल-ए-सबा में जिक्र-ए-हिज़रत रोक लेना
उससे सँभलेंगे नहीं जज़्बात उसने पी रखी है 


आशीष यादव

बुधवार, 29 जुलाई 2020

पानी गिर रहा है

2122 2122 2122 2122

इश्क बनता जा रहा व्यापार पानी गिर रहा है।
हुस्न रस्ते में खड़ा लाचार पानी गिर रहा है

चंद जुगनू पूँछ पर बत्ती लगाकर सूर्य को ही
बेहयाई से रहे ललकार पानी गिर रहा है

टाँगकर झोला फ़कीरी का लबादा ओढ़कर अब
हो रहा खैरात का व्यापार पानी गिर रहा है

बाप दादों की कमाई को सरे नीलाम कर वह
खुद को साबित कर रहा हुँशियार पानी गिर रहा है

झूठ के लश्कर बुलंदी की तरफ बढ़ने लगे हैं
साँच की होने लगी है हार पानी गिर रहा है

रविवार, 14 जून 2020

यह प्रणय निवेदित है तुमको

हे रूपसखी हे प्रियंवदे
हे हर्ष-प्रदा   हे मनोरमे
तुम रच-बस कर अंतर्मन में
अंतर्तम को   उजियार करो
यह प्रणय निवेदित है तुमको
स्वीकार करो,   साकार करो

अभिलाषी मन, अभिलाषा तुम
अभिलाषा   की  परिभाषा  तुम
नयनानांदित   -    नयनाभिराम
हो   नेह-नयन  की  भाषा   तुम
हे चंद्र-प्रभा हे कमल-मुखे
हे नित-नवीन हे सदा-सुखे
उद्गारित   होते   मनोभाव
इनको ढालो, आकार करो
यह प्रणय निवेदित है तुमको
स्वीकार करो   साकार करो

मैं तपता थल तुम हो छाया
मैं सदा दीन   तुम हो माया
जब-जब लिक्खा, तुमको लिक्खा
जब-जब गाया, तुमको गाया
हे सुमुखि-केशिनी-रूपवते
हे मधुर-भाषिता, मुग्ध-मते
इस विस्तारित आकर्षण का
कुछ तो स्नेहिल आधार करो
यह प्रणय निवेदित है तुमको
स्वीकार करो    साकार करो

आशीष यादव

मंगलवार, 2 जून 2020

कुछ रचनाएँ एक साथ


 मैं यह सोच कर कुछ पोस्ट कर रहा हूँ कि आप अवश्य पढेंगें।

1:-
याद है हाँ

अकेले तुम नहीं यारा
तुम्हारे साथ और भी बात
मुझे हैं याद

कि जैसे फूल खिला हो
तुम हसीं, बिलकुल महकती सी
चहकती सी
 मृदुल किरणों में धुलकर आ गई
और छा गई
जैसे कि बदली जून की
तपती दोपहरी से धरा को छाँव देती
ठाँव देती हो मुसाफिर को

कि जैसे झील हो गहरी
कि ये भहरी निगाहें
काजलों की कोर में खीँचे मुझे
भींचे कि जैसे
हार सी बाहें गले में डालकर
और ढाल कर खुद में मुझे
तुम प्यार देती
वार देती थी स्वयं को

मेरी जानाँ,
मुझे है याद यह भी
कि तेरी जुल्फें लहरकर
बादलों का रूप लेतीं
और देती प्यार की बूंदें
कि जिनमें भीगकर
तन तर हो जाता
और पाता स्नेह-
 सुख उर में समाता
याद है

हाँ याद है
पूरब में अंगड़ाई लिए
सूरज की लाली से तुम्हारे होंठ
कि जिनसे लिपटकर खेलती मेरी तमन्ना
और तुम हँसती हुई
कोमल गुलाबों को मेरे होठों पे रखती
और मैं आनंद का परिपाग पाता
भीग जाता
याद है
हाँ याद है।

आशीष यादव

2:-
हाँ तुम सपने में आई थी

होठों की पंखुड़ी सजाये
बालों के बादल लहराए
गालों पर लालिमा सुबह की
माथे पर बिंदिया चमकाए
जब तुमको मैंने देखा तो
पास खड़ी तुम मुस्काई थी
हाँ तुम सपने में आई थी

यौवन का शृंगार सलोना
मुग्ध-मुदित सा मन का कोना
देह सुगन्धित अरब इत्र सी
साँसों का फिर ख़ुशबू होना
थामा मेहंदी के हाथों को,
अजब अदा से बलखाई थी
हाँ तुम सपने में आई थी

तुमको अपने पास बिठाया
मैने इक अरमान सजाया
तुम्हे देखने की चाहत में
बाकी का संसार भुलाया
जब तेरे घूँघट को टारा
सीने से लग शरमाई थी
हाँ तुम सपने में आई थी

आगे अधरों का प्याला था
यौवन का मधुमय हाला था
इनको पाने की चाहत में
आलिंगन करने वाला था 
ज्यों ही इन पर होंठ रखे, बस...
नींद खुली फिर तन्हाई थी
हाँ तुम सपने में आई थी

आशीष यादव

3:-
सच सच बोलो आओगी ना

जब सूरज पूरब से पश्चिम
 तक चल चल कर थक जाएगा
और जहाँ धरती अम्बर से 
मिलती है उस तक जाएगा

चारो ओर सुनहला मौसम
और सुनहली लाली होगी
और लौटते पंछी होंगें
खेत-खेत हरियाली होगी

दिन भर के सब थके थके से
अपने घर को जाते होंगे
कभी झूम कर कभी मन्द से
पवन बाग लहराते होंगे

तुम भी उसी बाग के पीछे
आकर उसी आम के नीचे
झूम-झूम कर मेरे ऊपर
तुम खुद को लहराओगी ना
सच सच बोलो आओगी ना

जब बसन्त में भाँति-भाँति के
सुंदर-सुंदर फूल खिलेंगें
और प्रणय के इस मौसम में
नेह मेह अनुकूल मिलेंगें

अनुकूलन के इस मौसम में
जब आम-आम बौराएँगे
जब बाग-बाग में कली-कली
भौंरे-भौंरे मड़राएँगे

जब-जब शाखों पर मस्ती में
कोयलें कुँहुक कर  गाएँगीं
और ओस की बूँदे गिरकर
चाँदी की सी बन जाएँगीं

बोलो प्रिये ताल के पीछे
हाँ-हाँ उसी आम के नीचे
मेरी बाहों के घेरे में
सुंदर गीत सुनाओगी ना
सच सच बोलो आओगी ना

आशीष यादव

 4:-
तुमने उसकी याद दिला दी

जाने अनजाने में कितनी
जिसे सोचते रातें काटीं
लम्हों-लम्हों में किश्तों में
जिनको अपनी साँसें बाटीं
कभी अचानक कभी चाहकर
जिसे ख़यालों में लाता था
और महकती मुस्कानों पर
सौ-सौ बार लुटा जाता था

उसकी बोली बोल हृदय में
तुमने जैसे आग लगा दी
तुमने उसकी याद दिला दी

अँधियारी रजनी में खिलकर
चम-चम करने लगते तारे
इक चंदा के आ जाने से
फ़ीके पड़ने लगते सारे
शीतल शांत सजीवन नभ में
रजत चाँदनी फैलाता था
तम-गम में भी मेघ-लटों को
खिसकाता औ' मुस्काता था

यादों पर आवरित घटा को
तुमने जैसे एक हवा दी
तुमने उसकी याद दिला दी

आशीष यादव

5:-
कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो

जैसे ये मनमोहक सावन
जैसे पवन बसन्ती पावन
जैसे उर मे बस जाती है
हरी-भरी यह धरा लुभावन
तुम इस भाँति लुभा जाती हो
कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो

जैसे वात मलयजी डोले
जैसे पेंगें भरे हिंडोले
जैसे ताँक-झाँक करने को
चंदा घन-वातायन खोले
मेरे हृदय समा जाती हो
कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो

ज्यों प्राची मे सुबह की लाली
बौराये आमों की डाली
जैसे चलती उतान होकर
नदी कोई अल्हड़ मतवाली
ऐसे मुझ-पर छा जाती हो
कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो

ज्यों जाड़ो मे धूप निकलती
पर्वत से ज्यों बर्फ पिघलती
जैसे पतझड़ के जाने पर
नई-नई कोंपलें निकलती
अद्भुत, मन हर्षा जाती हो
कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो

आशीष यादव

6:-
सरिता

हे शान्त स्निग्ध जल की धारा
तुम कलकल कलरव की हो गान
हो लिपटे बेलों की वितान
तुम वसुन्धरा की शोभा हो
हे आन मान सरिता महान
तुझमे दिखता जीवन सारा
हे शान्त स्निग्ध जल की धारा

तुझमे निज-छवि लखते उडगन
यह विम्ब देख हर्षाता मन
सुषमा ऐसी नयनों मे बसा
रहता बस मे किसका तन मन
दिखता तुझमे चन्दा प्यारा
हे शान्त स्निग्ध जल की धारा

हे मिट्टी की सोंधी सुगन्ध
बाँधे सबको जो पाश बन्ध
तुम अद्भुत और अलौकिक हो
बाँधेगा तुमको कौन छन्द
छन्दों की कहाँ ऐसी कारा
हे शान्त स्निग्ध जल की धारा

 हे रश्मि प्रभा मे श्वेत जाल
अनुपम मनोहारी चन्द्रभाल
उर्वशी रेणुका सी लगती
(तुम स्वयं अप्सरा सी लगती)
यौवन धारे कंचुक विशाल
वह तुमसे कौन नही हारा
हे शान्त स्निग्ध जल की धारा

7:-
भादों की अमावस
अमावस की रात बहुत सुकून देती है
भादों की अमावास हो तो क्या कहने
अन्यथा हर रात
किसी न किसी पहर
चाँद आ ही जाता है

वो चेहरा
जिस पर मै नाज़ करता था
जिसे अपना समझता था
दिख जाता है इस चंदा में
इसकी चांदनी
इसकी झलक
ठेल देती है मुझे अतीत में
कि
जब मै अपने चाँद को
हाथों में लेकर
देखा करता था
अद्भुत सौंदर्यपूर्ण, दागरहित
लगता,
 इसी से सृष्टि दृष्टिगोचर है

एक पूरनमासी,
जो अँधेरा भर गयी मेरे जीवन में
चाँद मेरे सामने था, और भी चमकदार
किन्तु मेरी निशा काली, और भी काली
 वो मेरी हथेलियों से छलक कर,
अन्य अंक का हो गया था
इस गुरुत्व प्रभाव से दृग समंदर में
ज्वारीय तूफ़ान उमड़ पड़ा था

चक्षुपट जब तक रोकें
झरना अपनी सरहदें छोड़ चुका था
मेरे लिए बची थी
उजली रात की काली रजनी
भादों की अमावास

आशीष यादव

बुधवार, 15 अप्रैल 2020

याद है हाँ

अकेले तुम नहीं यारा
तुम्हारे साथ और भी बात
मुझे हैं याद

कि जैसे फूल खिला हो
तुम हसीं, बिलकुल महकती सी
चहकती सी
 मृदुल किरणों में धुलकर आ गई
और छा गई
जैसे कि बदली जून की
तपती दोपहरी से धरा को छाँव देती
ठाँव देती हो मुसाफिर को

कि जैसे झील हो गहरी
कि ये भहरी निगाहें
काजलों की कोर ये खीँचे मुझे
भींचे कि जैसे
हार सी बाहें गले में डालकर
और ढाल कर खुद में मुझे
तुम प्यार देती
वार देती थी स्वयं को

मेरी जानाँ,
मुझे है याद वह भी
कि तेरी जुल्फें लहरकर
बादलों का रूप लेतीं
और देती प्यार की बूंदें
कि जिनमें भीगकर
तन तर हो जाता
और पाता स्नेह-
 सुख उर में समाता
याद है हाँ

हाँ याद है
पूरब में अंगड़ाई लिए
सूरज की लाली से तुम्हारे होंठ
कि जिनसे लिपटकर खेलती मेरी तमन्ना
और तुम हँसती हुई
कोमल गुलाबों को मेरे होठों पे रखती
और मैं आनंद का परिपाग पाता
भीग जाता
याद है
हाँ याद है।

आशीष यादव

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

कोरोना

नहीं हमारी नहीं तुम्हारी 
अखिल विश्व में महा-बिमारी 
आई पैर पसार 
भैया मत छोड़ो घर-द्वार 
भैया मत छोड़ो घर-द्वार 

निकल चीन से पूर्ण जगत में डाल दिया है डेरा 
यह विषाणु से जनित बिमारी खतरनाक है घेरा 
रहो घरों में रहो अकेले 
नहीं लगाओ जमघट मेले 
कहती है सरकार 
भैया मत छोड़ो घर-द्वार

नहीं आम यह सर्दी-खाँसी इसका नाम कोरोना 
नहीं दवाई इसकी, होने पर केवल है रोना 
इसीलिए मत घर से निकलो 
धीर धरो पतझड़ से निकलो 
मानो राजदुलार 
बेटे मत छोड़ो घर-द्वार 

एक दूसरे से मीटर भर दूरी रखो बनाके 
सेनीटाइज रहो, रहो तुम मुँह पर मास्क लगाके 
नहीं मिलाओ हाथ किसी से 
हाथ जोड़कर करो सभी से 
भैया नमस्कार 
बाबू मत छोड़ो घर-द्वार 

हाथ बराबर साबुन से धोने की आदत डालो 
और नाक-मुँह ढक कर राखो जीवन शुद्ध बना लो 
रखो बराबर गैप बनाकर 
मगर सभी से द्वेष मिटाकर 
भजो नाथ करतार 
भैया मत छोड़ो घर-द्वार 

आशीष यादव