बुधवार, 3 अगस्त 2011

वो

वो, जो काले नकाब में,
अक्सर टी0 वी0 में दिख जाता है|
है इतना महत्वपूर्ण व्यक्ति
की मुख्य पृष्ट पे आता है|
वो जिसे देख के,
लोग एकबारगी
कांप जाते है
कभी सोचा है
किसी ने
वो व्यक्ति कहा से आता है|

वो

वो, जो काले नकाब में,
अक्सर टी0 वी0 में दिख जाता है|
है इतना महत्वपूर्ण व्यक्ति
की मुख्य पृष्ट पे आता है|
वो जिसे देख के,
लोग एकबारगी
कांप जाते है
कभी सोचा है
किसी ने
वो व्यक्ति कहा से आता है|

फिर क्यों तू ही मन को भाये

और बहुत कुछ जग में सुन्दर, फिर क्यों तू ही मन को भाये|
आग बुझाता है जब पानी, ये बरखा क्यों अगन लगाए||

जी करता है, पिघल मै जाऊं, तेरे साँसों की गरमी में|
अजब सुकून मुझे मिलता है तेरे हाथों की नरमी से||
मै तुझमे मिल जाऊं ऐसे, कोई मुझको ढूंढ़ न पाए|
आग बुझाता है जब पानी, ये बरखा क्यों अगन लगाए|
और बहुत कुछ जग में सुन्दर, फिर क्यों तू ही मन को भाये|

जब-जब गिरती नभ से बूँदें , मै पूरा जल जल जाता हूँ|
जी करता है भष्म हो जाऊं, पर तुमको ना पता हूँ||
तू अंगार जला दे मुझको, कहीं पे कुछ भी छूट न पाए|
और बहुत कुछ जग में सुन्दर, फिर क्यों तू ही मन को भाये|
आग बुझाता है जब पानी, ये बरखा क्यों अगन लगाए||

तड़प-तड़प के रह जाता हूँ, जैसे मछली जल बिन तरसे|
बहुत सताती हो तुम मुझको, जब-जब ये बादल है बरसे||
मेरी प्यास बुझा दे ऐसे, सारा बदन ही तर हो जाए |
और बहुत कुछ जग में सुन्दर, फिर क्यों तू ही मन को भाये|
आग बुझाता है जब पानी, ये बरखा क्यों अगन लगाए||