शुक्रवार, 28 अगस्त 2020

तरही गजल

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जिंदादिली से जब वो किसानी में आएगा 

खाने का लुत्फ़ दाल-मखानी में आएगा 


पाले कभी न तुमने मवेशी तो क्या पता 

गायों को स्वाद कौन से सानी में आएगा


किलकारियां दालान में गूँजेगीं जिस घड़ी 

"बचपन का दौर फिर से जवानी में आएगा" 


ठाकुर से जा मिले हैं कथाकार आजकल 

होरी कहाँ किसी की कहानी में आएगा 


ये क्या कि तूने पार की सूखी हुई नदी 

असली हुनर नदी की रवानी में आएगा 


माँ भारती के वास्ते कुरबाँ जो हो गए 

शेरों का अक्स उनकी निशानी में आएगा 


आशीष यादव

सोमवार, 24 अगस्त 2020

ये ज़िंदगी का हसीन लमहा

 (12122)×4

ये ज़िंदगी का हसीन लमहा

गुजर गया फिर तो क्या करोगी
जो जिंदगी के इधर खड़ा है

उधर गया फिर तो क्या करोगी

तुम्हें सँवरने का हक दिया है

वो कोई पत्थर का तो नहीं है
लगाये फिरती हो जिसको ठोकर

बिखर गया फिर तो क्या करोगी

कि जिनकी शाखों पे तो गुमां है

मगर उन्हीं की जड़ों से नफरत
वो आँधियों में उखड़ जड़ों से

शज़र गया फिर तो क्या करोगी

जिसे अनायास कोसती हो

छिपाए बैठा है पीर सारी
तुम्हारी नज़रों से गिर के आखिर

वो मर गया फिर तो क्या करोगी

किवाड़ दिल के लगा रखी हो

नज़र की खिड़की खुली हुई है
कोई निग़ाहों से सीधे दिल में

उतर गया फिर तो क्या करोगी

तू जिसकी उल्फ़त में जी रही है

कुछ उसकी नीयत भली नहीं है
वो खा के कसमें दिखा के सपने

मुकर गया फिर तो क्या करोगी

आशीष यादव

सोमवार, 10 अगस्त 2020

मगर हड़का रहा है

 उसकी ना है इतनी सी औकात मगर हड़का रहा है 

झूठे में ही खा जाएगा लात मगर हड़का रहा है 


औरों की बातों में आकर गाल बजाने वाला बच्चा 

जिसके टूटे ना हैं दुधिया दाँत मगर हड़का रहा है 


जिसके आधे खर्चे अपनी जेब कटाकर दे रहे हैं 

अबकी ढँग से खा जायेगा मात मगर हड़का रहा है 


आदर्शों मानवमूल्यों को छोड़ दिया तो राम जाने 

कितने बदतर होंगे फिर हालात मगर हड़का रहा है 


उल्फत की शमआ पर पर्दा डाल रहा है बदगुमानी 

कटना मुश्किल है नफरत की रात मगर हड़का रहा है 


आशीष यादव

गुरुवार, 6 अगस्त 2020

कइसे होई गंगा पार

जिनिगी भर बस पाप कमइला 
कइसे करबा गंगा पार 

जुलुम सहे के आदत सभके 
के थामी हाथे हथियार 

केहू नाही बनी सहाई 
बुझबा जब खुद के लाचार 

काम न करबा घिसुआ जइसे 
कहबा गंदा हव संसार 

गैर क बिटिया बहू निहारल 
हवे डुबावल धरम अपार 

जइसन करबा ओइसन भरबा 
करनी हव फल कै आधार 

पढ़ल कुबुद्धी के समझावल 
भीत से फोरल हवे कपार 

आशीष यादव

मंगलवार, 4 अगस्त 2020

मोहब्बत

जय व पराजय में देती जो सोहबत|

खुदा की है वो दस्तकारी मोहब्बत||

 

यही पंथ है नेक शान्ती का केवल|

मानवता को है सवांरी मोहब्बत||

 

मिल जुल के जो हमको रहना सिखाती|

बनी आज शिक्षक हमारी मोहब्बत||

 

मंजिल तक पहुचाये हमराह के संग|

इक सूत में बांधें प्यारी मोहब्बत||

 

बनिहारी कैसे हो सकती है इसमें|

किसी की नहीं काश्तकारी मोहब्बत||

 

नहीं तुम बचोगे नहीं हम बचेंगे|

अगर रो पड़ी जो लाचारी मोहब्बत||

 

संकल्प लें, एक तिल ना घटे ये|

हमारी मोहब्बत, तुम्हारी मोहब्बत||

सोमवार, 3 अगस्त 2020

उसने पी रखी है

वो न समझेगा हसद की बात उसने पी रखी है
सिर्फ़ होगी प्यार की बरसात उसने पी रखी है

होश में दुनिया सिवा अपने कहाँ कुछ सोचती है
कर रहा है वो सभी की बात उसने पी रखी है

मुँह पे कह देता है कुछ भी दिल में वो रखता नहीं है
वो समझ पाता नहीं हालात उसने पी रखी है

झूठ मक्कारी फ़रेबी ज़ुल्म का तूफ़ाँ खड़ा है
क्या वो सह पायेगा झंझावात? उसने पी रखी है

जबकि सब दौर-ए-जहाँ में लूटकर घर भर रहे हों
वो लुटाता चल रहा सौगात उसने पी रखी है

आखिरी वस्ल-ए-सबा में जिक्र-ए-हिज़रत रोक लेना
उससे सँभलेंगे नहीं जज़्बात उसने पी रखी है 


आशीष यादव