बुधवार, 14 सितंबर 2011

अमावस की रात

अमावस की रात अब बहुत सुकून देती है
वो भी भादों की अमावस हो तो क्या कहने
उसके अलावा हर रात को
किसी न किसी पहर चाँद आ ही जाता है

वो चेहरा
जिस पर मै नाज़ करता था जिसे मै बस अपना समझता था
दिख जाता है इस निशापति में

इसकी चांदनी
इसकी झलक
ठेल देती है मुझे अतीत में

जब मै अपने चाँद को
हाथों में लेकर
देखा करता था
अद्भुत सौंदर्यपूर्ण, दागरहित
लगता, इसी से सृष्टि दृष्टिगोचर है

एक पूरनमासी,
जो अँधेरा भर गयी मेरे जीवन में
चाँद मेरे सामने था, और भी चमकदार
किन्तु मेरी निशा काली, और भी काली


वो मेरी हथेलियों से छलक कर,

अन्य अंक का हो गया था
इस गुरुत्व प्रभाव से दृग समंदर में

ज्वारीय तूफ़ान उमड़ पड़ा था

चक्षुपट जब तक रोकें
झरना अपनी सरहदें छोड़ चुका था
मेरे लिए बची थी
उजली रात की काली रजनी
भादों की अमावस

बुधवार, 3 अगस्त 2011

वो

वो, जो काले नकाब में,
अक्सर टी0 वी0 में दिख जाता है|
है इतना महत्वपूर्ण व्यक्ति
की मुख्य पृष्ट पे आता है|
वो जिसे देख के,
लोग एकबारगी
कांप जाते है
कभी सोचा है
किसी ने
वो व्यक्ति कहा से आता है|

वो

वो, जो काले नकाब में,
अक्सर टी0 वी0 में दिख जाता है|
है इतना महत्वपूर्ण व्यक्ति
की मुख्य पृष्ट पे आता है|
वो जिसे देख के,
लोग एकबारगी
कांप जाते है
कभी सोचा है
किसी ने
वो व्यक्ति कहा से आता है|

फिर क्यों तू ही मन को भाये

और बहुत कुछ जग में सुन्दर, फिर क्यों तू ही मन को भाये|
आग बुझाता है जब पानी, ये बरखा क्यों अगन लगाए||

जी करता है, पिघल मै जाऊं, तेरे साँसों की गरमी में|
अजब सुकून मुझे मिलता है तेरे हाथों की नरमी से||
मै तुझमे मिल जाऊं ऐसे, कोई मुझको ढूंढ़ न पाए|
आग बुझाता है जब पानी, ये बरखा क्यों अगन लगाए|
और बहुत कुछ जग में सुन्दर, फिर क्यों तू ही मन को भाये|

जब-जब गिरती नभ से बूँदें , मै पूरा जल जल जाता हूँ|
जी करता है भष्म हो जाऊं, पर तुमको ना पता हूँ||
तू अंगार जला दे मुझको, कहीं पे कुछ भी छूट न पाए|
और बहुत कुछ जग में सुन्दर, फिर क्यों तू ही मन को भाये|
आग बुझाता है जब पानी, ये बरखा क्यों अगन लगाए||

तड़प-तड़प के रह जाता हूँ, जैसे मछली जल बिन तरसे|
बहुत सताती हो तुम मुझको, जब-जब ये बादल है बरसे||
मेरी प्यास बुझा दे ऐसे, सारा बदन ही तर हो जाए |
और बहुत कुछ जग में सुन्दर, फिर क्यों तू ही मन को भाये|
आग बुझाता है जब पानी, ये बरखा क्यों अगन लगाए||

शुक्रवार, 13 मई 2011

छोड़ के पिजरवा पराय गईलू चिरई|

छोड़ के पिजरवा पराय गईलू चिरई|

सबहीं के सनेहिया भूलाय गईलू चिरई|

निक नाही लागे अब घरवा अंगनवा,

तोहई के खोजे घूमि चारो और मनवा|

कवनी खतोका में लूकाय गईलू चिरई|

सबहीं के सनेहिया भूलाय गईलू चिरई|

रोवेलिन भौजी देखा, रोवे महतारी|

बाबू जी भैया बईठी रोवेलन दुवारी|

सबसे पिरितिया छोडाय गईलू चिरई|

छोड़ के पिजरवा पराय गईलू चिरई|

बाछी के कहाई अब सोना के कहाई|

इहे राग धईके देखा रोवत बानी मई|

नयना के लोरवा सुखी गईलू चिरई|

छोड़ के पिजरवा पराय गईलू चिरई|

भौजी के बबुनी भैया के मोटकी|

प्यार से बोलावें कहिके बाबू जी छोटकी|

काहे कुलही नमवा भूलाय गईलू चीरई|

सबहीं के सनेहिया भूलाय गईलू चीरई|

Ashish yadav

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

कुछ समय में यहाँ से चले जायेंगे,



कुछ समय में यहाँ से चले जायेंगे,
इक नयी ज़िन्दगी को फिर अपनाएंगे|
याद आएगा कुछ, कुछ भूलेगा नहीं,
बाँध यादों की गठरी को ले जायेंगे|

क्या पता होगा अपना ठिकाना कहाँ,
क्या करें तय की हमको है जाना कहाँ|
मंजिल सामने होके आवाज देगी,
वक़्त के रास्ते हमको आजमाएंगे|
कुछ समय में .......................

तब तमाम ऑफिस के छोड़ कर मामले,
जी होगा साथ दोस्तों के कॉलेज चलें|
तब न होंगे ये दिन, ये समय, ये घडी,
गर होंगे तो ये दिन ही नज़र आयेंगे|
कुछ समय में................................

जी करेगा चलो आज बंक मार लें,
दूसरों का असाइनमेंट उतार लें|
चाह कर भी न कर पायेंगे ये कभी,
दबा कर के तमन्ना घुटे जायेंगे|
कुछ समय में यहाँ से चले जायेंगे,

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

बनकर साकी आया हूँ

बनकर साकी आया हूँ मै आज जमाने रंग|
ऐसी आज पिलाऊंगा, सब रह जायेंगे दंग||

अभी मुफिलिसी सर पर मेरे, खोल न पाऊं मधुशाला|
फिर भी आज पिलाऊंगा मै हो वो भले आधा प्याला|
ऐ मेरे पीने वालों तुम, अभी से यूँ नाराज न हो|
मस्त इसी में हो जावोगे, बड़ी नशीली है हाला|

एक-एक पाई देकर मै जो अंगूर लाया हूँ|
इमानदारी की भट्ठी पे रख जतन से इसे बनाया हूँ|
तनु करने को ये न समझना, किसी गरीब का लहू लिया|
राजनीति से किसी तरह मै अब तक इसे बचाया हूँ|

हर बार तू मदिरा क्यूँ पीता, जो बनी है झूठे वादों से|
पल भर का है नशा जिसमे , जो बिकती है जल्लादों से|
गर पीना ही है तुझको तो, आज ले तू कुछ ऐसा पी|
तुझ पे नशा कुछ ऐसे चढ़े, न उतरे किन्ही इरादों से|

मुफ्त पिलाऊंगा सबको मै, दाम नहीं कुछ भी लूँगा|
होने वाली नशा का मै फिर नाम नहीं कुछ भी दूंगा|
इसके नशे में होकर तुम हर गम औ' फ़िक्र भूल जाओगे|
मस्त होकर तुम जियोगे, मस्त होकर मै भी जी लूँगा|

खुद साकी मै बनू आज, खुद ही बन जाऊं हाला भी|
अधरों से मुझे लगा ले तू, बन जाऊं ऐसा प्याला भी|
मेरे नशे में तुम झूमो, मेरा ही नशा बस तुमपे हो|
यदि खोल न पाऊं मधुशाला, बन जाऊं खुद मधुशाला भी|

इस अम्बर की जरुरत क्या, अम्बर ही वसन हो जाएगा|
भूलेगा ओछी मर्यादा, पी इतना मगन हो जाएगा|
ये कष्ट दुस्सह पीड़ा तन की, और मन की पिपासा जाएगी|
जब छोड़ सजे पैमानों को, सच्ची मदिरा अपनाएगा|

कही न कोई सजावट है, टूटा प्याला पर मेरा है|,
लेकिन इसमें तू माने तो, कुछ अधिकार भी तेरा है|.
'यदुकुल' मेरा और मिलाना पानी दूध में बात सही|,
पर मेरी हाला सच्ची है , जैसे रात सबेरा है|,.


अभी अचानक ध्यान हुआ, ऐसी भी मिली थी मधुशाला|,
बरबस ही नशा छ जाता था , बस देख उसकी यौवन हाला|.
साकी बने नयन उसके , कभी देते दावत पीने की|,
जब पीने को तैयार हुआ, हा ! कहाँ खो गया वो प्याला|.

हा ! मेरे होठों तक आकर , छीन गया मेरा प्याला|,
एक बूँद भी हलक के निचे , जा न सकी उसकी हाला|,
देश के ठेकेदारों ने मिलकर उसको ऐसे लूटा|,
साकी अब तक होश हीन है , गुमशुम सी है मधुशाला|.
गुमशुम सी है मधुशाला............................................

रविवार, 6 मार्च 2011

तेरा ख़याल

हसीं इतना है तेरा ख्याल, पल भर के लिए दिल से निकलता नहीं|
पहले जैसे भी हम जी लिए पर, जीवन अब तेरे बिन देखो चलता नहीं||

वो गज़ब का समय था हमारे लिए, तेरी पहली नज़र का, पहले प्यार का|
सारी बाते बिछड़ जायेंगी एक दिन , कैसे भूलूंगा दिन तेरे इकरार का||
तेरे पहलू में रहने की जिद पे अड़ा, लाख बहलाऊं ये दिल बहलाता नहीं|
हसीं इतना है तेरा ख़याल...............................................

तेरे गेसुओं की घनी छाँव में, मेरा डेरा बने, एक बसेरा बने|
मेरी हर शाम हो अब इन्ही के तले, अब इन्ही के तले हर सवेरा बने||
ये खुमारी तुम्हारी है ऐसी चढ़ी, लाख सम्हालूं ये दिल सम्हलता नहीं|
हसीं इतना है तेरा ख़याल...............................................

तेरी भौंहे की जैसे हो कोई कटार, ये पलक इस फलक से भी अच्छे बने|
बीच में जिनके आँखों की संजीवनी, पीकर ही मेरे आगे का जीवन चले||
जीवन दायिनी को फिर कैसे भूलूं, जीवन इसके बिना जबकि चलता नहीं|
हसीं इतना है तेरा ख़याल...............................................

होंठ ऐसे की जैसे हो प्याला कोई, ये छलकती नशीली गुलाबी शराब|
इस कदर अधरों से लगा के पियूँ, छोड़कर के हया भूल कर अपनी आब||
मस्त होकर नशे में तेरे ऐसे चलूँ, मदमस्त शराबी हो चलता कहीं|
हसीं इतना है तेरा ख़याल...............................................

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

तुम


तुम्हारे ही सहारे से मेरा हर पल गुजरता है,
तुझ में डूब कर के ही मेरा पल-पल गुजरता है|

मै कितना प्यार करता हूँ तुम्हे किस तरह बतलाऊं,
जो बेहोश हूँ तेरी याद में क्यों होश में आऊं|

हसीं हो तुम बहुत सचमुच बहुत ही खुबसूरत हो,
बस आशिक मै नहीं तेरा, सभी की तुम जरुरत हो|

तुम्हारे होंठ तो मुझको कोई गुलाब लगते है,
तुम्हारी झील सी आँखें है या शराब लगते है|

गुजारूं रात मै कोई तेरी जुल्फों की छावों में,
यही इच्छा मेरी बस जाऊं मै तेरी निगाहों में|

तुम तो रात भर मुझको बहुत ही याद आती हो,
जो सोता हूँ तो आकर सपने में जगाती हो|

तुम्हारे साथ हैं मजबूरियां मै भी समझाता हूँ,
जब तुम बात करती हो किसी से तो मै जलता हूँ|

वफ़ा मानो मेरी वफ़ा से क्यों इंकार करती हो,
बेवफा हूँ अगर तो मुझसे तुम क्यों प्यार करती हो|

अगर ऐसी बात बात है तो सुबूत.....................

मेरे ही खून से तुम हाथ की मेहंदी रचा लेना,
दे दूंगा जान भी अपनी कभी तुम आजमा लेना|

बुधवार, 19 जनवरी 2011

वो कौन है-2

वो कौन है,

अतीत जैसा पास है,

या कि मेरा आज है,

व आगे का एहसास है|

मैं फंसा इन उलझनों में, सोचता,

वो कौन है|

जो गा सकूँ वो गान है,

कि मिला सकूँ वो तान है,

या कि मेरा सम्मान है|

ये सुलझ जाए पहेली, जान लूँ,

वो कौन है|

मधुरव भरा वो साज है,

या कि नवोढ़ा लाज है,

मेरे लिए क्यूँ राज है?

एक रूप सदिश बने तब, कह सकूँ,

वो कौन है|

गुल है वो कि बाग़ है,

धुन कोई या राग है,

या ओस है कि आग है|

सुन्घू कि गाऊं या जलूं, अज्ञात कि,

वो कौन है|