वो भी भादों की अमावस हो तो क्या कहने
उसके अलावा हर रात को
किसी न किसी पहर चाँद आ ही जाता है
वो चेहरा
जिस पर मै नाज़ करता था जिसे मै बस अपना समझता था
दिख जाता है इस निशापति में
इसकी चांदनी
इसकी झलक
ठेल देती है मुझे अतीत में
जब मै अपने चाँद को
हाथों में लेकर
देखा करता था
अद्भुत सौंदर्यपूर्ण, दागरहित
लगता, इसी से सृष्टि दृष्टिगोचर है
एक पूरनमासी,
जो अँधेरा भर गयी मेरे जीवन में
चाँद मेरे सामने था, और भी चमकदार
किन्तु मेरी निशा काली, और भी काली
वो मेरी हथेलियों से छलक कर,
अन्य अंक का हो गया था
इस गुरुत्व प्रभाव से दृग समंदर में
ज्वारीय तूफ़ान उमड़ पड़ा था
चक्षुपट जब तक रोकें
झरना अपनी सरहदें छोड़ चुका था
मेरे लिए बची थी
उजली रात की काली रजनी
भादों की अमावस