मंगलवार, 2 जून 2020

कुछ रचनाएँ एक साथ


 मैं यह सोच कर कुछ पोस्ट कर रहा हूँ कि आप अवश्य पढेंगें।

1:-
याद है हाँ

अकेले तुम नहीं यारा
तुम्हारे साथ और भी बात
मुझे हैं याद

कि जैसे फूल खिला हो
तुम हसीं, बिलकुल महकती सी
चहकती सी
 मृदुल किरणों में धुलकर आ गई
और छा गई
जैसे कि बदली जून की
तपती दोपहरी से धरा को छाँव देती
ठाँव देती हो मुसाफिर को

कि जैसे झील हो गहरी
कि ये भहरी निगाहें
काजलों की कोर में खीँचे मुझे
भींचे कि जैसे
हार सी बाहें गले में डालकर
और ढाल कर खुद में मुझे
तुम प्यार देती
वार देती थी स्वयं को

मेरी जानाँ,
मुझे है याद यह भी
कि तेरी जुल्फें लहरकर
बादलों का रूप लेतीं
और देती प्यार की बूंदें
कि जिनमें भीगकर
तन तर हो जाता
और पाता स्नेह-
 सुख उर में समाता
याद है

हाँ याद है
पूरब में अंगड़ाई लिए
सूरज की लाली से तुम्हारे होंठ
कि जिनसे लिपटकर खेलती मेरी तमन्ना
और तुम हँसती हुई
कोमल गुलाबों को मेरे होठों पे रखती
और मैं आनंद का परिपाग पाता
भीग जाता
याद है
हाँ याद है।

आशीष यादव

2:-
हाँ तुम सपने में आई थी

होठों की पंखुड़ी सजाये
बालों के बादल लहराए
गालों पर लालिमा सुबह की
माथे पर बिंदिया चमकाए
जब तुमको मैंने देखा तो
पास खड़ी तुम मुस्काई थी
हाँ तुम सपने में आई थी

यौवन का शृंगार सलोना
मुग्ध-मुदित सा मन का कोना
देह सुगन्धित अरब इत्र सी
साँसों का फिर ख़ुशबू होना
थामा मेहंदी के हाथों को,
अजब अदा से बलखाई थी
हाँ तुम सपने में आई थी

तुमको अपने पास बिठाया
मैने इक अरमान सजाया
तुम्हे देखने की चाहत में
बाकी का संसार भुलाया
जब तेरे घूँघट को टारा
सीने से लग शरमाई थी
हाँ तुम सपने में आई थी

आगे अधरों का प्याला था
यौवन का मधुमय हाला था
इनको पाने की चाहत में
आलिंगन करने वाला था 
ज्यों ही इन पर होंठ रखे, बस...
नींद खुली फिर तन्हाई थी
हाँ तुम सपने में आई थी

आशीष यादव

3:-
सच सच बोलो आओगी ना

जब सूरज पूरब से पश्चिम
 तक चल चल कर थक जाएगा
और जहाँ धरती अम्बर से 
मिलती है उस तक जाएगा

चारो ओर सुनहला मौसम
और सुनहली लाली होगी
और लौटते पंछी होंगें
खेत-खेत हरियाली होगी

दिन भर के सब थके थके से
अपने घर को जाते होंगे
कभी झूम कर कभी मन्द से
पवन बाग लहराते होंगे

तुम भी उसी बाग के पीछे
आकर उसी आम के नीचे
झूम-झूम कर मेरे ऊपर
तुम खुद को लहराओगी ना
सच सच बोलो आओगी ना

जब बसन्त में भाँति-भाँति के
सुंदर-सुंदर फूल खिलेंगें
और प्रणय के इस मौसम में
नेह मेह अनुकूल मिलेंगें

अनुकूलन के इस मौसम में
जब आम-आम बौराएँगे
जब बाग-बाग में कली-कली
भौंरे-भौंरे मड़राएँगे

जब-जब शाखों पर मस्ती में
कोयलें कुँहुक कर  गाएँगीं
और ओस की बूँदे गिरकर
चाँदी की सी बन जाएँगीं

बोलो प्रिये ताल के पीछे
हाँ-हाँ उसी आम के नीचे
मेरी बाहों के घेरे में
सुंदर गीत सुनाओगी ना
सच सच बोलो आओगी ना

आशीष यादव

 4:-
तुमने उसकी याद दिला दी

जाने अनजाने में कितनी
जिसे सोचते रातें काटीं
लम्हों-लम्हों में किश्तों में
जिनको अपनी साँसें बाटीं
कभी अचानक कभी चाहकर
जिसे ख़यालों में लाता था
और महकती मुस्कानों पर
सौ-सौ बार लुटा जाता था

उसकी बोली बोल हृदय में
तुमने जैसे आग लगा दी
तुमने उसकी याद दिला दी

अँधियारी रजनी में खिलकर
चम-चम करने लगते तारे
इक चंदा के आ जाने से
फ़ीके पड़ने लगते सारे
शीतल शांत सजीवन नभ में
रजत चाँदनी फैलाता था
तम-गम में भी मेघ-लटों को
खिसकाता औ' मुस्काता था

यादों पर आवरित घटा को
तुमने जैसे एक हवा दी
तुमने उसकी याद दिला दी

आशीष यादव

5:-
कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो

जैसे ये मनमोहक सावन
जैसे पवन बसन्ती पावन
जैसे उर मे बस जाती है
हरी-भरी यह धरा लुभावन
तुम इस भाँति लुभा जाती हो
कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो

जैसे वात मलयजी डोले
जैसे पेंगें भरे हिंडोले
जैसे ताँक-झाँक करने को
चंदा घन-वातायन खोले
मेरे हृदय समा जाती हो
कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो

ज्यों प्राची मे सुबह की लाली
बौराये आमों की डाली
जैसे चलती उतान होकर
नदी कोई अल्हड़ मतवाली
ऐसे मुझ-पर छा जाती हो
कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो

ज्यों जाड़ो मे धूप निकलती
पर्वत से ज्यों बर्फ पिघलती
जैसे पतझड़ के जाने पर
नई-नई कोंपलें निकलती
अद्भुत, मन हर्षा जाती हो
कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो

आशीष यादव

6:-
सरिता

हे शान्त स्निग्ध जल की धारा
तुम कलकल कलरव की हो गान
हो लिपटे बेलों की वितान
तुम वसुन्धरा की शोभा हो
हे आन मान सरिता महान
तुझमे दिखता जीवन सारा
हे शान्त स्निग्ध जल की धारा

तुझमे निज-छवि लखते उडगन
यह विम्ब देख हर्षाता मन
सुषमा ऐसी नयनों मे बसा
रहता बस मे किसका तन मन
दिखता तुझमे चन्दा प्यारा
हे शान्त स्निग्ध जल की धारा

हे मिट्टी की सोंधी सुगन्ध
बाँधे सबको जो पाश बन्ध
तुम अद्भुत और अलौकिक हो
बाँधेगा तुमको कौन छन्द
छन्दों की कहाँ ऐसी कारा
हे शान्त स्निग्ध जल की धारा

 हे रश्मि प्रभा मे श्वेत जाल
अनुपम मनोहारी चन्द्रभाल
उर्वशी रेणुका सी लगती
(तुम स्वयं अप्सरा सी लगती)
यौवन धारे कंचुक विशाल
वह तुमसे कौन नही हारा
हे शान्त स्निग्ध जल की धारा

7:-
भादों की अमावस
अमावस की रात बहुत सुकून देती है
भादों की अमावास हो तो क्या कहने
अन्यथा हर रात
किसी न किसी पहर
चाँद आ ही जाता है

वो चेहरा
जिस पर मै नाज़ करता था
जिसे अपना समझता था
दिख जाता है इस चंदा में
इसकी चांदनी
इसकी झलक
ठेल देती है मुझे अतीत में
कि
जब मै अपने चाँद को
हाथों में लेकर
देखा करता था
अद्भुत सौंदर्यपूर्ण, दागरहित
लगता,
 इसी से सृष्टि दृष्टिगोचर है

एक पूरनमासी,
जो अँधेरा भर गयी मेरे जीवन में
चाँद मेरे सामने था, और भी चमकदार
किन्तु मेरी निशा काली, और भी काली
 वो मेरी हथेलियों से छलक कर,
अन्य अंक का हो गया था
इस गुरुत्व प्रभाव से दृग समंदर में
ज्वारीय तूफ़ान उमड़ पड़ा था

चक्षुपट जब तक रोकें
झरना अपनी सरहदें छोड़ चुका था
मेरे लिए बची थी
उजली रात की काली रजनी
भादों की अमावास

आशीष यादव

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