चल मन अब गोकुल के धाम
अद्भुत मनहर बाल रूप में मिल जाएंगे श्याम
कि चल मन अब……………………….
कटि करधनी शीश पर चोटी
मोर पंख सँग शोभित होती
धूलि भरे घुटनों बल चलते
यह छवि अति अभिराम
कि चल मन अब……………………….
कबहुँ दूध-दधि-माखन खाते
कबहुँ ग्वाल सँग गाय चराते
कबहुँ अधर पर धर के मुरलिया
सुर छेड़ें अविराम
कि चल मन अब……………………….
उनका (प्रभु का) बाल रूप मन भाता
इन रूपों से हृदय जुड़ाता
मोहन इन रूपों में कीजै
मम नैनन विश्राम
कि चल मन अब……………………….
कान्हा मोहन किशन कन्हैया
नंदलाल हे रास रचैया
विनती है मेरे होठों पर
हो बस तेरा नाम
कि चल मन अब……………………….
आशीष यादव (कवि एवं गीतकार)