मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

जिंदगी में तुम्हारी कमी रह गई

 मुझको क्या ना मिला जिंदगी में यहाँ 

पर कहीं आंख में इक नमी रह गई 

जिंदगानी की महफ़िल सजी तो मगर 

जिंदगी में तुम्हारी कमी रह गई 


मुझको लंबे सफर में यहाँ जो मिला 

साथ तुम ही रहे उनसे था फासला 

राह जिस पर कभी साथ गुजरे थे हम 

आँखें उस राह को ताकती रह गईं 

जिंदगानी की महफ़िल सजी तो मगर 

जिंदगी में तुम्हारी कमी रह गई 


घूमते घूमते खेत के मेड़ पर 

शाम गंगा किनारे किसी पेड़ पर 

एक होने की जो हमने बाँधी कभी

गाँठ वो उस जगह पर बँधी रह गई

जिंदगानी की महफ़िल सजी तो मगर 

जिंदगी में तुम्हारी कमी रह गई 


लोक मरजाद में गैर को चुन लिया 

जो तुम्हारा था उससे किनारा किया 

तुम गुजारी पिया संग हँस खेल कर

और हिस्से मेरी बेबसी रह गई 

जिंदगानी की महफ़िल सजी तो मगर 

जिंदगी में तुम्हारी कमी रह गई 


गुरुवार, 24 मार्च 2022

एक दिन स्वर्ग में (आशीष यादव)

 एक दिन स्वर्ग में घूमते-घूमते 

एक जगह रुक्मिणी राधिका से मिली 

एक दिन स्वर्ग में…………… 


सैकड़ों प्रश्न मन में समेटे हुए 

श्याम की प्रीत तन पर लपेटे हुए 

जोड़कर हाथ राधा के सम्मुख वहाँ 

एक रानी सहज भावना से मिली 

एक दिन स्वर्ग में …………….


देखकर राधिका झट गले लग गई 

साँवरे की महक से सुगंधित हुई 

प्रीत की प्रीत में घोलकर मन, बदन 

साधना प्रीत की साधना से मिली 

एक दिन स्वर्ग में…………… 


भेँटना हो गया बात होने लगीं 

एक दूजे की बातों में खोने लगीं 

जो जमाने से दोनों के मन में दबी 

थी कसक वो निठुर वेदना से मिली 

एक दिन स्वर्ग में…………… 


रुक्मणी ने कहा, क्या कमी हो गई 

तन-बदन सौंपकर श्याम की हो गई 

रुक्मिणी-श्याम क्यों ना जमाना कहे 

क्यों मेरी साधना वंचना से मिली 

एक दिन स्वर्ग में…………… 


राधिका ने कहा श्याम को भा गई 

सौंपकर तन-बदन श्याम को पा गई 

तुम गुजारी पिया संग हँस-खेल कर 

मैं विरह की सखी इंतहा से मिली 

एक दिन स्वर्ग में…………… 


तुम विवाहित हुई श्याम के संग में 

मैं समाहित हुई श्याम के रंग में 

तुमने पाया सखी देह का साथ, मै 

नेह की रँग भरी अल्पना से मिली 

एक दिन स्वर्ग में…………… 


आशीष यादव

मंगलवार, 25 जनवरी 2022

गणतंत्र दिवस गीत

 जय भारत के लोगों की 

जय भारत देश महान की 

जय जय जय गणतंत्र दिवस की

जय जय संविधान की

जय जय जय जय हिंद


अपनी धुनें बनाई हमने अपना राग बनाया था 

जिसमें समता, न्याय, आजादी का संकल्प समाया था 

एक अखंडित राष्ट्र के लिए गरिमा भाईचारा से 

हमने अपने गीत लिखे थे हमने खुद को गाया था 

जय लिक्खी संप्रभुता की जय लोकतंत्र कल्याण की 

जय जय जय गणतंत्र दिवस की

जय जय संविधान की

जय जय जय जय हिंद 


सूत कातते वंदे मातरम जन-गण-मन ने गाया था

नेक विचारों के करघे ने सुंदर वस्त्र बनाया था 

हीरों जैसे अनुच्छेद मोती सी अनुसूचियाँ जड़ित 

स्वतंत्रता दुल्हन को हमने संविधान पहनाया था 

चारों तरफ रोशनी फैली संविधान परिधान की 

जय जय जय गणतंत्र दिवस की

जय जय संविधान की

जय जय जय जय हिंद


आशीष आशीष

बुधवार, 5 जनवरी 2022

मैं पुलिस हूँ

 मैं पुलिस हूँ 

मैं पुलिस हूँ, मित्र हूँ 

मैं आपका ही प्यार हूँ 

आपकी खातिर खड़ा हूँ

आपका अधिकार हूँ 


शपथ सेवा की उठाया हूँ करूँगा आमरण 

धीर साहस के लिए मैंने किया वर्दी-वरण 

जुल्म-अत्याचार से चाहे प्रकृति की मार से

रात-दिन रक्षा करूँगा आपका बन आवरण 

मैं अहर्निश कमर कसकर 

वेदना में भी विहँसकर 

कर्म को तैयार हूँ

मैं पुलिस हूँ, मित्र हूँ 

मैं आपका अधिकार हूँ


आपकी होली दीवाली आपके रमज़ान में 

आपके झाँकी-जुलुस में आपके अभिमान में 

धूप हो बरसात हो चाहे कि झंझावात हो 

शान से रहता सड़क पर देश के सम्मान में 

क्या मेरी होली-दीवाली 

कौन रातें ईद वाली 

मैं स्वयं त्यौहार हूँ 

मैं पुलिस हूँ, मित्र हूँ 

मैं आपका अधिकार हूँ


देश के सीने पे जब दुश्मन चलाया गोलियाँ 

या महामारी ने ही विकरालता धारण किया 

त्रासदी की जंग में, खाकी नए ही ढंग में 

जान की बाजी लगा दी हौसला पैदा किया 

कौन सी गोली-कटारी 

कौन मारेगी बीमारी 

मैं स्वयं हथियार हूँ 

मैं पुलिस हूँ,  मित्र हूँ 

मैं आपका अधिकार हूँ


आशीष यादव

शनिवार, 1 जनवरी 2022

खुलके बोलूँगा

 खुलके बोलूँगा गलत है हुक्मरानी आपकी

शाह होंगे जाइए हमने न मानी आपकी 


आप उहदेदार हैं तो हद में रह कर बोलिए

आपको महँगी पड़ेगी बदजबानी आपकी


कितने चेहरे खिल उठे हैं आपके दीदार से

रब सदा महफूज रक्खे यह जवानी आपकी 


जान की बाजी लगा दी देश हित मे आपने

गीत बनकर गाई जाएगी कहानी आपकी



हो जहाँ पर खूँ पसीने की जरूरत मेह्रबाँ

काम आएगी भला क्या यह फुटानी आपकी 


ऐ मेरे मालिक ये दुनिया क्या बिगाड़ेगी भला

जिसके ऊपर दो घड़ी हो मेह्रबानी आपकी