मुझको क्या ना मिला जिंदगी में यहाँ
पर कहीं आंख में इक नमी रह गई
जिंदगानी की महफ़िल सजी तो मगर
जिंदगी में तुम्हारी कमी रह गई
मुझको लंबे सफर में यहाँ जो मिला
साथ तुम ही रहे उनसे था फासला
राह जिस पर कभी साथ गुजरे थे हम
आँखें उस राह को ताकती रह गईं
जिंदगानी की महफ़िल सजी तो मगर
जिंदगी में तुम्हारी कमी रह गई
घूमते घूमते खेत के मेड़ पर
शाम गंगा किनारे किसी पेड़ पर
एक होने की जो हमने बाँधी कभी
गाँठ वो उस जगह पर बँधी रह गई
जिंदगानी की महफ़िल सजी तो मगर
जिंदगी में तुम्हारी कमी रह गई
लोक मरजाद में गैर को चुन लिया
जो तुम्हारा था उससे किनारा किया
तुम गुजारी पिया संग हँस खेल कर
और हिस्से मेरी बेबसी रह गई
जिंदगानी की महफ़िल सजी तो मगर
जिंदगी में तुम्हारी कमी रह गई