गुरुवार, 18 नवंबर 2021

ये तुम्हारा तसव्वुर हसीं जानेमन

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ये तुम्हारा तसव्वुर हसीं जानेमन 

एक पल को भी दिल से निकलता नहीं 

पहले जैसे भी हम जी लिए हैं मगर 

जीवन अब तेरे बिन देखो चलता नहीं 


तेरी भौंहें की जैसे कटारी कोई

ये पलक इस फलक से भी अच्छे बने 

बीच में इक समंदर समेटे हुए 

माहताबी सरीखे ये नैना बने 

ये खुमारी तुम्हारी है ऐसी चढ़ी, 

लाख सम्हालूं ये दिल सम्हलता नहीं

ये तुम्हारा तसव्वुर हसीं जानेमन 

एक पल को भी दिल से निकलता नहीं 


फूल हो बेल हो या चहकती कली

नर्म दूबों का सुंदर गलीचा हो तुम

ये गुलाबी नयन ये महक संदली 

हुस्न का इक मुसलसल बगीचा हो तुम 

तेरे पहलू में रहने की जिद पे अड़ा, 

लाख बहलाऊं ये दिल बहलता नहीं 

ये तुम्हारा तसव्वुर हसीं जानेमन 

एक पल को भी दिल से निकलता नहीं 


होंठ ऐसे की जैसे हो प्याला कोई 

ये छलकती नशीली गुलाबी सुरा

तुम नज़ाकत के प्याले में भर के इन्हे 

तृप्त कर दो मुझे यूं पिला दो जरा

मस्त होकर तुम्हारे नशे में सनम 

यूं चलूं कि शराबी हो चलता कहीं 

ये तुम्हारा तसव्वुर हसीं जानेमन 

एक पल को भी दिल से निकलता नहीं 

गुरुवार, 4 नवंबर 2021

दीप जलाना

 दीप जलाना 


जहाँ दिखे अँधियार वहीं पर दीप जलाना 

छाये खुशी अपार वहीं पर दीप जलाना 


अपने मन के भीतर का जो पापी तम है 

'अयं निजः' का भाव जहाँ पलता हरदम है 

'वसुधा ही परिवार' जहाँ अंधेरे में है 

सबसे पहले यार वहीं पर दीप जलाना 

जहाँ दिखे अँधियार………………..


मुरझाए से होठों पर मुस्कान बिछाने 

छोटी-छोटी खुशियों को सम्मान दिलाने 

जिन दर दीप नहीं पहुँचे उन तक जाकर 

रोशन करना द्वार वहीं पर दीप जलाना 

जहाँ दिखे अँधियार………………..


मन में उत्सव धारे वह मुस्तैद खड़ा जो 

देश सुरक्षा खातिर घर से दूर पड़ा जो 

अपने देवो खातिर रखते दीप जहाँ पर 

उनके खातिर यार वहीं पर दीप जलाना 

जहाँ दिखे अँधियार……………….. 


आशीष यादव