शुक्रवार, 31 दिसंबर 2021

नव वर्ष पर 5 दोहे

 सबसे पहले आपको नाथ नवाता शीश

यही याचना, आपका मिलता रहे आशीष


जीवन मे उत्थान दे मंगलमय नव-वर्ष

नए साल में छूइए नए-नए उत्कर्ष


शुभकामना स्वीकारिये मेरी भी श्रीमान

शुक्ल पक्ष के चाँद सी बढ़े आपकी शान


जैसे इस ब्रम्हांड का नही आदि ना अंत

वैसे ही श्रीमान को खुशियाँ मिलें अनंत


धन-सम्पत से युक्त हों लोभ-मोह से हीन

उनको भी उद्धारिये जो हैं दीन-मलीन 


आशीष यादव

गुरुवार, 18 नवंबर 2021

ये तुम्हारा तसव्वुर हसीं जानेमन

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ये तुम्हारा तसव्वुर हसीं जानेमन 

एक पल को भी दिल से निकलता नहीं 

पहले जैसे भी हम जी लिए हैं मगर 

जीवन अब तेरे बिन देखो चलता नहीं 


तेरी भौंहें की जैसे कटारी कोई

ये पलक इस फलक से भी अच्छे बने 

बीच में इक समंदर समेटे हुए 

माहताबी सरीखे ये नैना बने 

ये खुमारी तुम्हारी है ऐसी चढ़ी, 

लाख सम्हालूं ये दिल सम्हलता नहीं

ये तुम्हारा तसव्वुर हसीं जानेमन 

एक पल को भी दिल से निकलता नहीं 


फूल हो बेल हो या चहकती कली

नर्म दूबों का सुंदर गलीचा हो तुम

ये गुलाबी नयन ये महक संदली 

हुस्न का इक मुसलसल बगीचा हो तुम 

तेरे पहलू में रहने की जिद पे अड़ा, 

लाख बहलाऊं ये दिल बहलता नहीं 

ये तुम्हारा तसव्वुर हसीं जानेमन 

एक पल को भी दिल से निकलता नहीं 


होंठ ऐसे की जैसे हो प्याला कोई 

ये छलकती नशीली गुलाबी सुरा

तुम नज़ाकत के प्याले में भर के इन्हे 

तृप्त कर दो मुझे यूं पिला दो जरा

मस्त होकर तुम्हारे नशे में सनम 

यूं चलूं कि शराबी हो चलता कहीं 

ये तुम्हारा तसव्वुर हसीं जानेमन 

एक पल को भी दिल से निकलता नहीं 

गुरुवार, 4 नवंबर 2021

दीप जलाना

 दीप जलाना 


जहाँ दिखे अँधियार वहीं पर दीप जलाना 

छाये खुशी अपार वहीं पर दीप जलाना 


अपने मन के भीतर का जो पापी तम है 

'अयं निजः' का भाव जहाँ पलता हरदम है 

'वसुधा ही परिवार' जहाँ अंधेरे में है 

सबसे पहले यार वहीं पर दीप जलाना 

जहाँ दिखे अँधियार………………..


मुरझाए से होठों पर मुस्कान बिछाने 

छोटी-छोटी खुशियों को सम्मान दिलाने 

जिन दर दीप नहीं पहुँचे उन तक जाकर 

रोशन करना द्वार वहीं पर दीप जलाना 

जहाँ दिखे अँधियार………………..


मन में उत्सव धारे वह मुस्तैद खड़ा जो 

देश सुरक्षा खातिर घर से दूर पड़ा जो 

अपने देवो खातिर रखते दीप जहाँ पर 

उनके खातिर यार वहीं पर दीप जलाना 

जहाँ दिखे अँधियार……………….. 


आशीष यादव 

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2021

सच्चाई के चोले से

सच्चाई के चोले से मैंने खुद को आजाद किया 

तब जाकर के बना मंतरी औ' खुद को आबाद किया


किये छिनैती जित्ती बारी उत्ती बारी धरै गए 

लिए सहारा राजनीति का ढंग नया ईजाद किया 


लड्डू बर्फी के झगड़े में दोनों गिरकर टूट गए 

"एक जरा सी जिद ने आखिर दोनों को बरबाद किया" 


हीरो बनिकै घूमि रहे थे हमौं हीरोइन कै साथै 

उनिकै बप्पा देख लिहिन फिर लातौं से संवाद किया 


हमरै बच्चों की अम्मा जब धइ कै हमकौ कूट दईं

अइसा होतै कोय न देखा, हमने दिल को शाद किया


हुनर छिछोरेपन का मुझ में ऐसे थोड़ी आया है 

लाते खाईं जेले काटीं तब खुद को उस्ताद किया


*आशीष यादव*

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2021

इसकी ग्रंथी उसकी गीता

 

इसकी ग्रंथी उसकी गीता फिर कुरान और वेद करेंगें
पहले मजहब मे बांटेंगें फिर वर्णों में भेद करेंगें
इनके बहकावे मे आकर आदमियत को भूल गए तो
फिर तो वही तुम्हारे वंशज पुश्तों-पुश्तों खेद करेंगें

नफरत की फसलें बोएँगे दूषित गाँव समाज करेंगें
जोड़ तोड़ करने वाले, बहकाने वाले काज करेंगें
जब तक एक रहोगे तब तक बाल नहीं बांका होगा
टूट गए तो सारे वहशी मिलकर तुमपर राज करेंगें

आशीष यादव

शुक्रवार, 24 सितंबर 2021

तेरी तस्वीर होठों से लगा लूँ, जो इजाजत हो

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तेरी तस्वीर होठों से लगा लूँ, जो इजाजत हो। 

उसे आगोश में लूँ, चूम डालूँ, जो इजाजत हो।


बहुत नायाब दौलत है तुम्हारे हुस्न की दौलत 

तुम्हारा हुस्न तुमसे ही चुरा लूँ जो इजाजत हो ।


नशीले नैन लाली होंठ की यूँ मुझ पे छाई है 

इन्हें मैं जाम समझूँ  पी लूँ पा लूँ जो इजाजत हो। 


वही सुंदर तरासा जिस्म जो एक बार देखा था 

उसे फिर यार नैनों में बसा लूँ जो इजाजत हो। 


कई नगमे तुम्हारी याद में लिक्खा किया मैंने 

उन्हें इक बार स्वर दूँ यार गा लूँ जो इजाजत हो। 


आशीष यादव

शनिवार, 18 सितंबर 2021

यहाँ एक बेटी चली नाँव लेके

 यहाँ एक बेटी चली नाँव लेके 

करेगी नदी पार कैसे? निरेखे 

खिवैया स्वयं है बड़ा फासला है 

भुजाएँ बली हैं बड़ा हौसला है


इसी हौसले के सहारे चली है 

हवाएँ दिशाएँ सवारें चली है

चली ज्ञान की ज्योति लाने चली है 

बहाने फसाने जलाने चली है


चली ज्ञान गंगा बहाने चली है 

पुराने रिवायात ढाने चली है

नई जंग को जीत जाने चली है

नया पाठ जैसे पढ़ाने चली है 


चलो सीख लो तोड़ दो रूढ़ियों को 

पढ़ाओ लिखाओ चलो बेटियों को 

पढ़ेगीं लिखेंगीं उजाला करेंगीं 

बुरे वक़्त में ये सँभाला करेंगीं  


अशीष यादव


रविवार, 5 सितंबर 2021

टीचर्स डे

 *हमारे गाँवों के प्राइवेट स्कूलों के गुरुओं को विशेष रूप से समर्पित* 


मैंने सुनी नकल की बात एक गुरु जी से 

पूछने लगा कि यह कैसी बेहयाई है 

जिसको पढ़ाते आप पूरे साल मर मर 

नकल कराने में शरम नहीं आई है 

गुरू जी तो उलटे ही मुझ पर चढ़ गए 

दिखता है बोले भ्रष्टाचार महँगाई है 

यही तो कमाने का सुघर अवसर है जी 

दो हजार प्रति माह भी कोई कमाई है


आशीष यादव

बुधवार, 1 सितंबर 2021

कहो सूरमा! जीत लिए जग?

 कहो सूरमा! जीत लिए जग? 

तुम्हें पता है जीत हार का? 


केवल बारूदों के दम पर 

फूँक रहे हो धरती सारी 

नफरत की लपटों में तुमने 

धधकाई करुणा की क्यारी 


कितना आतंकित है जीवन 

हरसू क्रंदन ही क्रंदन है 

मानवता की लाश बिछी है 

सहमा डरा विवश जन-जन है 


तुम कितने खुश हो लहरा कर 

बंदूकें - तलवारें - भाले 

ऐसी विषम घड़ी आई है 

दानवता को कौन सँभाले


किंतु नहीं यह जीत तुम्हारी 

सारी मानवता हारी है 

धर्म-कर्म सब हेय हुए हैं 

गुरुता पर लघुता भारी है


तुमको जिसने आदेश दिया

वह पापी नीच दरिंदा है 

वह लोभी वहशी हीन तुच्छ 

है पर के बिना परिंदा है 


तुमने अंगारों से जिसकी 

खातिर यह दुनिया नापी है 

चाहे अल्लाह-मसीहा हो 

चाहे कि देव हो पापी है 


तुमने जन्नत की चाहत में 

दुनिया नर्क बना डाली है 

ऐसे दुष्कर्मों की मंजिल 

पतित घिनौनी है काली है 


कितने दिन का है यह जीवन 

गिनती के ही कुछ सालों का 

वहशीपन में स्याह किया है 

तुमने मुँह अपने लालों का


दुनिया से जाने वालों में 

कुछ अब तक पूजे जाते हैं 

और वहीं कुछ आतंकी हैं 

आज तलक गाली खाते हैं 


हाँ हिसाब होता है होगा 

जब तुम भी उस तक जाओगे 

बारूदों की खेती वालों 

तब बारूदें ही पाओगे 




पता तुम्हें है जीत हार का? 

भय नफरत का द्वेष प्यार का? 


जाओ पहले पता करो फिर 

पूछो अपने अंतर्मन से 

केवल तन पर राज किया 

जा सकता है खंजर से धन से


आशीष यादव

गुरुवार, 1 जुलाई 2021

स्वयं को आजमाने को तू खुलकर आ जमाने में

स्वयं को आजमाने को तू खुलकर आ जमाने में 
बहुत अनमोल है जीवन गवाँता क्यों बहाने में 

नदी के पास बैठा है दबा के प्यास बैठा है 
तुझे मालूम है, तुझमें कोई एहसास बैठा है 
किनारे कुछ न पाओगे मिलेगा डूब जाने में

तुम्हारे सामने दुनियाँ सुनो रणभूमि जैसी है 
स्वयं का तू ही दुश्मन है स्वयं का तू हितैषी है 
कहीं पीछे न रह जाना स्वयं से ही निभाने में

कहाँ दसरथ की दौलत राम जी के काम आती है
सदा बाहें स्वयं की राह के काटें हटाती हैं 
स्वयं के बाहुबल से काम ले राहें बनाने में

जगा दे मन का बजरंगी जला दे आलसी लंका 
दिखा दे जोर पौरुष का बजा दे विश्व में डंका 
पड़ा विपदाओं का सागर भला है लाँघ जाने में

विचारों के महा-रण में स्वयं अर्जुन-कन्हैया बन 
पड़ी मझधार में नैया स्वयं का तू खेवैया बन
स्वयं ही शस्त्र बन जा तू स्वयं को जीत जाने में 

आशीष यादव

शुक्रवार, 18 जून 2021

जागरण गीत

 पूरब में जगी है भोर, पंछी करने लगे है शोर,

मुसाफिर तू भी जग जा, हो मुसाफिर तू भी जग जा,


जग जाएगा तो पायेगा जग में सुन्दर अमुल खजाना,
सोकर खोकर समय चूकि फिर रह जाए पीछे पछताना .
समय के रहते जाग, कि अपना हिस्सा ले तू आज,
मुसाफिर तू भी जग जा, हो मुसाफिर तू भी जग जा,

अपना सब कुछ दे देने को खड़े ये देखो पेड़ सयाने,
लेने की तो कोशिश कर तू पूरा मिलेगा सोलह आने.
लूट सके तो लूट, मिली है आज ये पूरी छूट,
मुसाफिर तू भी जग जा, हो मुसाफिर तू भी जग जा,

देख लुटाने को सूरज अब खोल रहा है अपना पिटारा,
पाने की तू कोशिश कर ले, पा जाएगा तू भी सितारा.
कोशिश से ले ले आज, वरना रह जाएगा राज़,
मुसाफिर तू भी जग जा, हो मुसाफिर तू भी जग जा,

अनवरत ये चलती नदिया, कह रही है चलता जा,
काम अभी तू कर ले अपना आगे का है भरोषा क्या?
श्रम से मिलता सुख, जो सोये पता है वो दुःख.
मुसाफिर तू भी जग जा, हो मुसाफिर तू भी जग जा,
हाँ हाँ मुसाफिर तू भी जग जा......

गुरुवार, 27 मई 2021

वरना पीठ दिखाने से तो अच्छा है तुम मर जाओ

 रणभेरी बजने से पहले अच्छा है तुम घर जाओ

वरना पीठ दिखाने से तो अच्छा है तुम मर जाओ

कितनी ही आशाएं तुमसे लगी हुई है, टूटेंगीं
कितनी ही तकदीरें तुमसे जुड़ी हुई हैं, रूठेगीं


तेरे पीछे मुड़ जाने से कितने सिर झुक जाएंगे
कितने प्राण कलंकित होंगे कितने कल रुक जाएंगे


उतर गए हो बीच समर तो कौशल भी दिखला जाओ
हिम्मत के बादल बन कर तुम विपदाओं पर छा जाओ

तप कर और प्रबल बनकर तुम शोलों बीच सँवर जाओ
वरना पीठ दिखाने से तो अच्छा है तुम मर जाओ 

आशीष यादव 

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

याद तुम्हारी

याद तुम्हारी क्या बतलाऊँ
कैसे कैसे आ रही है

चलने का अंदाज़ ठुमक कर
मचल-मचल कर और चहक कर
हाथों को लहरा-लहरा कर
अदा-अदा से और विहँस कर

तेरी सुंदर-सुंदर बातें
मन हर्षित है गाते-गाते
मैं कब से आवाज दे रहा
आ जाते हँसते-मुस्काते

तेरे गालों वाले डिम्पल
याद आते हैं मुझको पल-पल
मिसरी में पागे होठों के

नाज़ुक चुम्बन कोमल-कोमल

एक छवि मुस्कान बटोरे
मुझको अपने परितः घेरे
सुंदर सुखद समीर बहाती
बदली बन कर छा रही है

याद तुम्हारी क्या बतलाऊँ
कैसे कैसे आ रही है 


आशीष यादव

गुरुवार, 22 अप्रैल 2021

अधूरी जिंदगी को तूने आके कर दिया पूरा

अधूरी जिंदगी को तूने आके कर दिया पूरा 
बहुत कुछ था मेरी जानाँ, मगर मैं था अधूरा, हाँ अधूरा 
अधूरी जिंदगी को तूने आके कर दिया पूरा 

भटकता मरुथलों में तरुवरों की चाह मन में थी 
सफर में था मगर एक हमसफर की चाह मन में थी 
अनुकृति बन रही थी, मिट रही थी, रात दिन मन में 
मुहब्बत तक पहुंचने की असीमित चाह मन में थी 

अधूरा दिल, अधूरा ख़्वाब, अरमां था अधूरा, हाँ अधूरा 
अधूरी जिंदगी को तूने आके कर दिया पूरा

शनिवार, 20 मार्च 2021

मां की थपकी लोरी

 मां की थपकी लोरी बापू के नजराने याद आये| 

जब मै उनसे दूर हुआ अनमोल खजाने याद आये||

तुमको देखा, सुर्ख लबों को, इन आंखों को देखा तो|
साकी याद आया, सारे प्याले मयखाने याद आये||

बाहों में बाहें डाले जब उन जोड़ो को देखा तो|
तुम याद आये और तुम्हारे साथ जमाने याद आये||

हँसना इठलाना रुक जाना मुस्काना फिर चल देना|
इसको देखा तो उसके अन्दाज पुराने याद आये||

बातों पर लड़ना मिट जाना बात जबाँ की रख लेना|
उस बूढे बरगद को देखा लोग पुराने याद आये||

रविवार, 7 फ़रवरी 2021

कवनो देश नाहीं सुघ्घर हिन्दुस्तान से

सबसे सुंदर लुभावन पावन, 

इ बा मनभावन, 

कि सगरो जहान से 

कौनो देश नाही सुघ्घर हिंदुस्तान से 


उत्तर में देखा हो, हिमालय जेकर माथ बा 

दक्षिण में फइलल सागर 

गंगा कावेरी कृष्णा, नर्मदा गोदावरी 

बाँटेलीं अमरित घर घर 

कई तरह के फसल उगेला

कई तरह के फसल उगेला 

जन गण मन हरषेला 

लोग झूमेला बन मस्ताना

कि होके दीवाना 

रहेला सम्मान से 

कौनो देश नाहीं सुघ्घर हिंदुस्तान से 


अलगे-अलग में ह एकता के छाप हो 

भाषा पहिरावा भोजन 

इहां से उहां तक घुमबा त पईबा

केतनन दर्शन के दरसन 

उत्तर दक्षिण साथ रहेला 

उत्तर दक्षिण साथ रहेला 

पूरब पश्चिम साथे

माथे सबहीं लगावे ला माटी 

जुड़ावेला छाती

कि एकर अभिमान से 

कौनो देश नाही सुघर हिंदुस्तान से


माई के जइसन जे के देहल जाला दरजा

माई जस सम्मान हो 

एकरे से जुड़ल बाड़े तन मन धनवा 

माई से बा मान हो 

माई खातिर जान देवेला 

एकरे खातिर जान देवेला 

बच्चा-बच्चा धावे 

गावें गीत आशीष सुनावें

परमसुख पावें 

कि माई के गान से 

कौनो देश नहीं सुघर हिंदुस्तान से