शुक्रवार, 24 सितंबर 2021

तेरी तस्वीर होठों से लगा लूँ, जो इजाजत हो

 122  2122  2122  2122  2

तेरी तस्वीर होठों से लगा लूँ, जो इजाजत हो। 

उसे आगोश में लूँ, चूम डालूँ, जो इजाजत हो।


बहुत नायाब दौलत है तुम्हारे हुस्न की दौलत 

तुम्हारा हुस्न तुमसे ही चुरा लूँ जो इजाजत हो ।


नशीले नैन लाली होंठ की यूँ मुझ पे छाई है 

इन्हें मैं जाम समझूँ  पी लूँ पा लूँ जो इजाजत हो। 


वही सुंदर तरासा जिस्म जो एक बार देखा था 

उसे फिर यार नैनों में बसा लूँ जो इजाजत हो। 


कई नगमे तुम्हारी याद में लिक्खा किया मैंने 

उन्हें इक बार स्वर दूँ यार गा लूँ जो इजाजत हो। 


आशीष यादव

शनिवार, 18 सितंबर 2021

यहाँ एक बेटी चली नाँव लेके

 यहाँ एक बेटी चली नाँव लेके 

करेगी नदी पार कैसे? निरेखे 

खिवैया स्वयं है बड़ा फासला है 

भुजाएँ बली हैं बड़ा हौसला है


इसी हौसले के सहारे चली है 

हवाएँ दिशाएँ सवारें चली है

चली ज्ञान की ज्योति लाने चली है 

बहाने फसाने जलाने चली है


चली ज्ञान गंगा बहाने चली है 

पुराने रिवायात ढाने चली है

नई जंग को जीत जाने चली है

नया पाठ जैसे पढ़ाने चली है 


चलो सीख लो तोड़ दो रूढ़ियों को 

पढ़ाओ लिखाओ चलो बेटियों को 

पढ़ेगीं लिखेंगीं उजाला करेंगीं 

बुरे वक़्त में ये सँभाला करेंगीं  


अशीष यादव


रविवार, 5 सितंबर 2021

टीचर्स डे

 *हमारे गाँवों के प्राइवेट स्कूलों के गुरुओं को विशेष रूप से समर्पित* 


मैंने सुनी नकल की बात एक गुरु जी से 

पूछने लगा कि यह कैसी बेहयाई है 

जिसको पढ़ाते आप पूरे साल मर मर 

नकल कराने में शरम नहीं आई है 

गुरू जी तो उलटे ही मुझ पर चढ़ गए 

दिखता है बोले भ्रष्टाचार महँगाई है 

यही तो कमाने का सुघर अवसर है जी 

दो हजार प्रति माह भी कोई कमाई है


आशीष यादव

बुधवार, 1 सितंबर 2021

कहो सूरमा! जीत लिए जग?

 कहो सूरमा! जीत लिए जग? 

तुम्हें पता है जीत हार का? 


केवल बारूदों के दम पर 

फूँक रहे हो धरती सारी 

नफरत की लपटों में तुमने 

धधकाई करुणा की क्यारी 


कितना आतंकित है जीवन 

हरसू क्रंदन ही क्रंदन है 

मानवता की लाश बिछी है 

सहमा डरा विवश जन-जन है 


तुम कितने खुश हो लहरा कर 

बंदूकें - तलवारें - भाले 

ऐसी विषम घड़ी आई है 

दानवता को कौन सँभाले


किंतु नहीं यह जीत तुम्हारी 

सारी मानवता हारी है 

धर्म-कर्म सब हेय हुए हैं 

गुरुता पर लघुता भारी है


तुमको जिसने आदेश दिया

वह पापी नीच दरिंदा है 

वह लोभी वहशी हीन तुच्छ 

है पर के बिना परिंदा है 


तुमने अंगारों से जिसकी 

खातिर यह दुनिया नापी है 

चाहे अल्लाह-मसीहा हो 

चाहे कि देव हो पापी है 


तुमने जन्नत की चाहत में 

दुनिया नर्क बना डाली है 

ऐसे दुष्कर्मों की मंजिल 

पतित घिनौनी है काली है 


कितने दिन का है यह जीवन 

गिनती के ही कुछ सालों का 

वहशीपन में स्याह किया है 

तुमने मुँह अपने लालों का


दुनिया से जाने वालों में 

कुछ अब तक पूजे जाते हैं 

और वहीं कुछ आतंकी हैं 

आज तलक गाली खाते हैं 


हाँ हिसाब होता है होगा 

जब तुम भी उस तक जाओगे 

बारूदों की खेती वालों 

तब बारूदें ही पाओगे 




पता तुम्हें है जीत हार का? 

भय नफरत का द्वेष प्यार का? 


जाओ पहले पता करो फिर 

पूछो अपने अंतर्मन से 

केवल तन पर राज किया 

जा सकता है खंजर से धन से


आशीष यादव