रविवार, 29 जनवरी 2023

गज़ल: कोई मिलता नहीं दोस्ती के लिए

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कुछ ने हामी भरी तीरगी के लिए 

कुछ जले शौक़ से रौशनी के लिए 


ख़ुद से मिलने की चाहत ने मुझ से कहा 

आईए बैठिए दो घड़ी के लिए  


मज़हबों का ये खेला ख़तरनाक है

इसमें कोई नहीं है किसी के लिए 


मैंने देखा नहीं कोई भी देवता

(कौन अल्लाह भगवान या देवता) 

माँ मिली है मुझे बंदगी के लिए 


कितने लाचार हो मुफ़लिसी ने कहा 

कोई मिलता नहीं दोस्ती के लिए


हम लिखें हुस्न पर? हुंह! अजी छोड़िए 

हैं ज़मीन और भी शाइरी के लिए 


आशीष यादव 


शुक्रवार, 20 जनवरी 2023

गज़ल : पत्थरों पर चल रहा हूँ

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पत्थरों पर चल रहा हूँ

रास्तों को छल रहा हूँ 1


लग रहा हूँ आज मीठा

सब्र का मैं फल रहा हूँ 2


कर दिया उनको पवित्तर 

यार गंगा जल रहा हूँ 3 


अब नहीं ख्वाहिश किसी की

हाँ कभी बेकल रहा हूँ 4


आज इतनी गाड़ियाँ है

मैं कभी पैदल रहा हूँ 5


याद आऊँ, मुस्कुरा दो 

वह तुम्हारा कल रहा हूँ 6


मैं डुबोया हूँ खुद ही को

स्वयं का दलदल रहा हूँ 7


चल रहा हूँ चाल अपनी

दुश्मनों को खल रहा हूँ 8 


कर रहे परदा मुझी से 

वो कि जिनका कल रहा हूँ 9 


योगचारी हूँ, कभी पर

हुस्न पर पागल रहा हूँ 10 


हो गया खुद बेसहारा

जो कभी संबल रहा हूँ 11 


आशीष यादव 

बुधवार, 18 जनवरी 2023

तस्वीर : एक मोहक चित्र

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क्या पता उस लोक में दिखती हैं कैसी अप्सराएँ

किस तरह चलतीं मचल कर किस तरह से भाव खाएँ

कौन सा जादू लिए फिरतीं सभी पर मार देतीं

किस तरह पुचकारती हैं किस तरह से प्यार देतीं 

क्या महावर और मेहँदी आँख में काजल अनोखा

केशिनी मृगचक्षुणी हैं सत्य, या उपमान धोखा 

किस तरह श्रृंगार रचती किस तरह गेशू सजाएँ

क्या पता कितनी सही है आमजन की कल्पनाएँ


आज देखी थी परी जो हाल कुछ उसका सुनाऊँ

देखता ही रह गया कितना करूँ वर्णन बताऊँ

मोहिनी सूरत मनोहर ललित मंजुल रम्य काया 

उदर समतल उरस उन्नत नैन में कौतुक समाया 

रंग होठों का निकलते सूर्य का लालित्य लेकर 

यूँ त्वचा जैसे मिले हों दूध, कॉफी और केशर 

केश थे इतने घने लंबे स्वयं उपमान जैसे 

यूँ कहें की स्वर्ग की परियों के भी अरमान जैसे 


दाहिना था पाँव सीधा और बाएँ को मुड़ाकर

इस तरह कुछ वह खड़ी थी आलमारी से टिकाकर 

शर्ट थी काली बटन थे आठ जो उसमे लगे थे

दो बटन ऊपर खुले थे और दो नीचे खुले थे 

दाहिना हिस्सा सुनीले जींस के भीतर पड़ा था था 

जींस नीला यूँ कि जैसे नाभि तक सट कर चढ़ा था 

कुहनियो के ठीक नीचे शर्ट की मोहड़ी चढ़ी थी

और बाएँ हाथ में क्या जँच रही काली घड़ी थी 


बीच वाली अंगुली में एक सोने की अँगूठी 

जानु तक लटकी हुई क्या लग रही थी वह अनूठी 

आँख पर गॉगल्स काले फ्रेम था जिनका सुनहरा 

मुख प्रदीपित यूँ कि जिनपर स्वयं आ दिनमान ठहरा 

था यही शृंगार सीमित किन्तु अद्भुत लग रही थी

रूप से वह स्वर्ग अप्सरियों को मानो ठग रही थी 

केशिनी के एक मोहक चित्र ने मुझको लुभाया 

यह रहा वृत्तांत जो देखा वही मैने सुनाया 



ऋतु शीत रवानी में अपने

 ऋतु शीत रवानी में अपने

ऊर्ध्वगी जवानी में अपने  

चहुँओर सर्द को बढ़ा रही

जीवन वह्निः तक बुला रही

थी जगह जगह जल रही आग

प्रमुदित होकर जन रहे ताप 

कौड़े में जैसे उठी ज्वाल

मन मोह लिया इक अधर लाल 

रति जैसी जिसकी छाया थी

वह थी समक्ष या माया थी

पहने थे वसन तरीके से 

सब सज्जित स्वच्छ सलीके से 

कुंतल को उसने झटक दिया 

मनसिज प्रसून पर पटक दिया

कितने उद्गार उठे मन में 

ताड़ित से कौंध रहे तन में

मन हुआ अनोखा गीत लिखूँ

मै एक दहकती शीत लिखूँ  


पर सोच रहा था यदि गीत

कविता लेखन है कर्म मेरा

तो क्या जिस पर लिख रहा 

स्वीकृति लेना उससे है धर्म मेरा? 

इस पर सोचूँगा और कभी

हे नाथ करूँगा गौर कभी

मैं अभी आपसे बस उसका

व्यवहार जानने आया हूँ

लिख सकूँ गीत उसके ऊपर 

अधिकार माँगने आया हूँ 


आशीष आशीष