मंगलवार, 31 दिसंबर 2019

नव वर्ष तुम्हें मंगलमय हो

नव वर्ष तुम्हें मंगलमय हो 

घर आँगन में उजियारा हो
दुःखों का दूर अँधियारा हो
हो नई चेतना नवल स्फूर्ति
नित नव प्रभात आभामय हो
नव वर्ष तुम्हें मंगलमय हो

नित नई नई ऊँचाई हो
हृद प्राशान्तिक गहराई हो
नित नव आयामों को चूमो
चहुँओर तुम्हारी जय जय हो
नव वर्ष तुम्हें मंगलमय हो

जो खुशियाँ अब तक नहीं मिलीं
जो कलियाँ अब तक नहीं खिलीं
जीवन के नूतन अवसर पर
उनका मिलना-खिलना तय हो
नव वर्ष तुम्हे मंगलमय हो

आशीष यादव

रविवार, 22 दिसंबर 2019

सच सच बोलो आओगी ना

सच सच बोलो आओगी ना

जब सूरज पूरब से पश्चिम
 तक चल चल कर थक जाएगा
और जहाँ धरती अम्बर से
मिलती है उस तक जाएगा

चारो ओर सुनहला मौसम
और सुनहली लाली होगी
और लौटते पंछी होंगें
खेत-खेत हरियाली होगी

दिन भर के सब थके थके से
अपने घर को जाते होंगे
कभी झूम कर कभी मन्द से
पवन बाग लहराते होंगे

तुम भी उसी बाग के पीछे
आकर उसी आम के नीचे
झूम-झूम कर मेरे ऊपर
तुम खुद को लहराओगी ना
सच सच बोलो आओगी ना


जब बसन्त में भाँति-भाँति के
सुंदर-सुंदर फूल खिलेंगें
और प्रणय के इस मौसम में
नेह मेह अनुकूल मिलेंगें

अनुकूलन के इस मौसम में
जब आम-आम बौराएँगे
जब बाग-बाग में कली-कली
भौंरे-भौंरे मड़राएँगे

जब-जब शाखों पर मस्ती में
कोयलें कुँहुक कर  गाएँगीं
और ओस की बूँदे गिरकर
चाँदी की सी बन जाएँगीं

बोलो प्रिये ताल के पीछे
हाँ-हाँ उसी आम के नीचे
मेरी बाहों के घेरे में
सुंदर गीत सुनाओगी ना
सच सच बोलो आओगी ना

आशीष यादव

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2019

चुड़ैल

          मै पश्चिम वाली कोठरी में आलमारी पर पड़े सामानों को इधर-उधर कर के देख रहा था| तभी मेरी नज़र एक निमंत्रण कार्ड पर पड़ी| कार्ड के ऊपर देखने पर पता चला की वो निमंत्रण भैया के नाम से था, प्रेषक वाली जगह के नाम से मै अनजान था| कौतुहल वश मैंने बड़ी आसानी से अन्दर के पत्र को निकाल कर देखा, अगले दिन बारात आने वाली थी| दर्शनाभिलाषी में पढने पर ज्ञात हुआ की वह निमंत्रण भैया के एक मित्र के बहन की शादी का था| मै और भैया एक ही स्कूल में पढ़े थे और उनके लगभग सारे मित्र मुझे भी जानते थे|
            भैया उस समय घर पर नहीं थे, तीन-चार दिन के लिए कहीं गए थे| याद नहीं आ रहा  कि कहाँ गए थे| मैंने ये बात अपनी माँ से कही तो उन्होंने मुझे अगले दिन वहां जाने की अनुमति दे दी| मुझे ढंग से गाडी चलाने नहीं आती थी| अतः शाम को ही मैंने गाँव के इन्द्र देव चाचा से बात कर ली और वो राजी भी हो गए जाने के लिए| हमारे और उनके घर से खासी मित्रता थी|
             उनका घर हमारे घर से तकरीबन तीस किलोमीटर दूर था| घर के लोगों ने कहा की वहां जाकर तुम लोगों को कुछ काम-वाम भी करना पड़ेगा , सही भी था लड़की की बारात आ रही थी| और रीति-रिवाज के तहत जब किसी लड़की के घर बारात आती है तो गाँव में सब लोग मदद के लिए आगे आते है|
             हम दोनों लोग सुबह करीब नौ बजे घर से निकल गए थे| रास्ता सही नहीं था, सड़कें उखड गयीं थी| उस राह पर पैदल चलना भी मुश्किल था, यद्यपि  वह मुख्य मार्ग था| हम लोग कुछ आगे जाकर कट लिए, एक खडंजा पकड़ लिए| अब पहले से कहीं आराम था| सुनसान सड़क पर हम लोग चले जा रहे थे| कुछ आगे जाने पर हमें जो दिखाई पड़ा  उसे देख कर हम रुक गए| खडंजे से होकर एक पगडंडी बागीचे में जाती थी| बगीचा  बहुत बड़ा था| बहुत से लोग एकत्रित थे| भीड़ कुछ नहीं तो पाँच सौ  रही होगी| जैसे गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव पड़े, सारे लोग उसी भीड़ की तरफ खींचे चले जा रहे थे|
             हमने भी गाड़ी को पगडण्डी पर उतार लिया और बागीचे के एक तरफ गाड़ी खड़ी कर दी|
            लोग बैठे थे, शांत तालाब की तरह,और जैसे छोटी मछलियाँ भरी मात्रा में उतरातीं हैं, उसी तरह की कानाफूसी चालू थी| बागीचे के बीच से थोडा हट कर एक बड़ा सा वर्गाकार क्षेत्रफल गोबर से लिपा हुआ था| उसमें कई छोटी-बड़ी मूर्तियाँ स्थापित की गयी थी| माटी की बेदीयाँ  वहाँ बनायीं गयी थीं|
            देख कर यह समझ  में आ रहा था की कोई  पूजा  होने वाली है| लेकिन कैसी पूजा? यह हमारे लिए कौतुहल का विषय था| अंततोगत्वा  मैंने एक बुजुर्ग  से पूछ  ही लिया कि  "बाबा  ये कैसी पूजा होने वाली है| इतनी भीड़ क्यों इकठ्ठा हुई  है|"

             बूढ़े दादा ने कहानी बतानी शुरू की तो हम सुनाने में ध्यानमग्न हो गए|
            "बेटा, जो गाँव दिखाई दे रहा है" दक्षिण की तरफ हाथ से इशारा करते हुए कहा, " उसके पीछे एक विशाल बरगद का पेड़ है, उसी पर एक भूत रहता है | रात को वह बरगद को कभी-कभी बहुत जोर से झकझोरता है | आने जाने वालों को पहले वह बहुत परेशान करता था | परन्तु अब वह परेशान नहीं करता |' दादा ने अंतिम बात जोर देकर कही|
            "फिर बाबा", मैंने उत्सुकता वश पूछा| उन्होंने आगे बात बतानी शुरू की|

             "बेटा, पिछले महीने बरगद के किनारे वाले पोखरे में एक लड़की को उसने पकड़ कर डुबो दिया | लोग देखते ही रह गए | लड़की उसमे डूब कर मर गयी | मछली  मारने  वाले सभी  लड़के वहां से भाग गए | देखने वाले बताते है कि पानी  में बड़ा-बड़ा बुलबुला  निकलता था|पानी अचानक  शांत  हो जाता, अचानक घेरदार लहरें  पैदा होजाती |
              "आगे बाबा" मेरी तरह सुनने वालों में से एक अन्य लड़के ने कौतुहल वश पूछा,
               “बेटा, लड़कों को हमने बहुत रोका था, बहुत मन किया था, मत जाना मछलियाँ पकड़ने, लेकिन वे न माने| आखिर चली ही गयी एक जान |"
               "पर बाबा, लड़की को किसी ने बचाने का प्रयास नहीं किया |" मैंने सशंकित होकर पूछा|
                "तुम नहीं समझोगे बेटा! कौन जाएगा अपनी जान देने| यह  भूत भी इसी तालाब में डूब कर मरा था| लोगों ने ये भी सुना है कि रात को ये जान मांगता था|"

                "बाबा, लड़की तो चली गयी, जान तो उसे मिल गयी, फिर ये पूजा क्यों ?"
                "बेटा, उसके मरने के दुसरे ही दिन, परधान जी कि बहू और बेटी सुबह खेत से आ रही थी | बिल्कुल अँधेरा था | उसी समय एकाएक बहू को वह दिखाई दी | उसे पकड़ ली | अब छोडती ही नहीं है| बहू तभी से बीमार है |कभी हँसती है तो कभी दहाडें मार कर रोने लगती है | कभी-कभी तो नाचने भी लगती है | कभी कहती है, मै बिना जान लिए नहीं जाने वाली| कहीं कुछ अशुभ न हो जाय, फिर से किसी कि जान न चली जाय, इसलिए सोखा जी आ रहें है |"
                 मैंने चाचा से कहा कि आज देख ही लिया जाय कि कैसे पूजा होगी, और वो भी सहमत हो गए| जनता सोखा जी के आने इन्तजार कर रही थी| मै भी बहुत खुश था| नामी-गिरामी सोखा हैं| बूढ़े बाबा ने हमें बताया कि बहुत बड़े-बड़े भूतों को इन्होने बाँध कर रखा है| और भी अनेक बातें बतायीं|
                 लगभग एक बजे बजे एक चमचमाती कार आई| कार को बागीचे में आने के लिए विशेष रूम से खेत में ही लीक बनायीं गयी थी| उसमे से एक हृष्ट-पुष्ट अधेड़ उम्र युवक, धवल धोती में, शरीर पर धोती के अलावा केवल एक खादी की चादर डाले हुए निकला| चेहरे पर भयानकता,आँखें लाल-लाल, बड़ी-बड़ी भौंहे, माथे पर चौड़ा तिलक था , जो संभवतः राख और चन्दन मिश्रित था| पैरों में खडाऊं थे|
                "यही सोखा जी है", बूढ़े बाबा ने हमसे कहा|
                सोखा जी कार से उतरते ही खूब जोर की साँस खींचे, और चौके में आ गिरे|
                सारी जनता चुप थी| लोग केवल सोख जी के क्रिया कलापों को उत्सुकता भरी नजरो से देख रहे थे| सोखा जी कैसे आँख बंद करते, कैसे धीरे-धीरे खोलते, फिर हाथ को भींचते हुए जमीन पर प्रहार करते| पूजा सामग्री पेश होने लगी थी| बहू भी चौके में आकर यथास्थान बैठ गयी थी| सोखा जी ने मंत्र जाप शुरू किया और चौके के बायीं तरफ बैठी महिलाओं ने देवी गीत|
                सब कुछ बहुत रोचक लग रहा था| बहू धीरे-धीरे झुमने लगी| तरह-तरह की अजीब-ओ-गरीब हरकते करने लगी| मैंने ऐसा सुना तो बहुत था, पर साक्षात् दर्शन का लाभ पहली बार उठा रहा था| मेरी उत्सुकता बढती ही जाती थी| करीब आधे घंटे तक वह झूमती रही, कुछ न बोली| इधर पूजा शुरू थी| कुछ समय बाद सोखा जी के इशारे पर देवी गीत बंद हो गयी| सोखा जी मंडप में इधर से उधर पैंतरे बदल रहे थे| कभी इस मूर्ति के पास तो कभी उस मूर्ति के पास| विशाल जन समूह शांत सागर की तरह था| कोई आदमी कुछ न बोलता| इससे तो अधिक आवाज रात के घनघोर सन्नाटे की होती है| कभी-कभी सोखा जी की गरज  सुनाई पड़ती थी|
               आगे क्या होगा? कैसे भागेगा भूत? अभी कौन सी प्रक्रियाएं होगी? मै यही सोच रहा था, और मंडप में चल रही गतिविधियों  को देख रहा था| अचानक एक और घटना घटी| मैंने क्या, सबने देखा, सोखा जी ने एक बकरे को मंडप में लाने का आदेश दिया| धोती में, बलिष्ट काया वाले दो लोग, जिन पर रौबदार मूंछें  भी थी, बकरे को मंडप में ले आये| शराब की बोतलें भी मंडप में लायी गयीं|

               सोखा जी ने बहु से कहना शुरू किया, " तुने आज तक इस गाँव को बहुत संकट में डाले रखा है | मै तुमसे कहता हूँ की छोड़ दे सबको | तुझे जीव चाहिए तो ले ले बलि, सबको मुक्त कर संकट से | वरना अच्छा नहीं होगा | अगर तुने गाँव नहीं छोड़ा तो मै तुम्हे नहीं बक्शुंगा |  सोखा जी व्याखान शुरू था| मै, निरीह प्राणी बकरे को देख रहा था| वो क्या कर रहे थे, मेरा ध्यान हट गया था| एक बड़ा सा स्वस्थ बकरा, टिका लगा था| वो अनजान प्राणी, बेचारा क्या जानता था की मुझे बहुत जल्दी ही दुनिया छोड़ देनी है| वो तो चना खाने में ही मशगूल था|

                मेरी नज़र इन्द्रदेव चाचा की तरफ फिरी, उनकी नज़र केवल बकरे पर ही टिकी थी| मै भी यही सोच रहा था की यदि भुत या चुड़ैल को जीव चाहिए तो क्या वो केवल एक बकरे की बलि से संतुष्ट हो जायेंगे| यदि हाँ तो वे पहले ही क्यों न बकरे को ही पकड़ लेते हैं| उसे ही मार डालते है| या ये मनुष्य ही स्वार्थी है जो निज रक्षा के लिए एक बेजुबान को मार देता है| क्या एक बकरे की बलि से पूरा गाँव चुडैल से मुक्त हो जाएगा| मुझे इसके बारे में तो ज्यादा पता नहीं था| मैंने सोच की अगर ऐसा कने से गाँव बच सकता है तो फिर ठीक है|

               अचानक सोखा जी की एक हरकत ने हमारा ध्यान अपनी तरफ खिंचा| वो बोतल खोलकर बहु को जबरदस्ती पिलाने की चेष्ठा करते| बहू ने पिने से इनकार कर दिया| सोखा ने लोगो को समझाते हुए कहा," देख रहे आप लोग, ये चुडैल बड़ी जिद्दी है |" पूरी जनता चुप होकर तमाशा देख रही थी| पूजा शुरू थी| सोखा जी ने सबको संकेत दिया, " मै ज्यों ही शराब को इस नीच के मुँह से लगाऊंगा, आप लोग आँखे बंद कर लीजियेगा |" , बलि देने वाले आदमियों से बोले," बहू ज्यों ही बोतल मुँह से छुएगी तुम बलि दे देना |"
                सोखा जी ने महिलाओं की तरफ देवी गीत गाने का संकेत दिया| देवी गीत शुरू हो गयी थी| सोखा जी पूजा करने लगे| दशांग इत्यादि का धुंवा पुरे मंडप में फ़ैल गया था| सब तरफ धुंवा ही धुंवा| सोखा जी की हरकते चालू थी| वो मन्त्र पढ़े जा रहे थे, और कभी मंडप के इस कोने तो कभी मंडप के उस कोने| कभी इस मूर्ति के पास तो कभी दूसरी के पास| अचानक उन्होंने शराब की बोतल उठाई| बहू लगातार झूम रही थी| सोखा जी बहू की तरफ बढे| बलि देने वाले मनुष्यों की तरफ देखा, और फिर जनता की तरफ| लोगो ने अपनी आँखे बंद कर ली| मैंने भी अपनी आँखे बंद की|
                 एक बहुत जोर की थप की आवाज सुनाई दी, फिर धम्म की| सबने अपनी आँखे खोल ली| सब हैरान थे| सब अचरज भरी नजर से वो नजारा देख रहे थे| मेरी बगल से चाचा गायब थे| वे मंडप में थे| उनके हाथ में गड़ासा था| उनके जोरदार थप्पड़ से सोखा जी जमीन पर थे| चाचा सोखा जी के तरफ गड़ासा ताने कह रहे थे, " बोल, जब तू जानता था की ये मामला बहुत बड़ा है, तुम्हारे बस की बात नहीं है तो तुने रुपयों के चक्कर में इसे अपने हाथ में क्यों ले लिया | मै तुम्हारी बलि दूंगा तब चुड़ैल भागेगी |" मेरे सहित सब जनता हैरत में थी| चाचा ये क्या कह रहे थे| क्या वे जानते है की ये कैसा मामला है| क्या उन्हें भी सोखैती आती है| सोखा जी हाथ जोड़ लिए, और पाँव पकड़ कर गिड़गिडाने हुए कहा, " सरकार मुझे माफ़ कर दीजिये | आज से मै ये काम नहीं करूँगा |"
                 "चल तू अब अपनी और चुड़ैलों की हकीकत बता | तभी ये जनता चाहे तो तुझे माफ़ कर सकती है |"
                   और मंडप से बाहर आते ही मुझे कहा की मै पुलिस को फोन करूँ| मैंने वैसा तुरंत कर दिया|
सोखा ने जब हकीकत बतानी शुरू की तो लोग हैरान रह गए, क्या ऐसा भी होता है?
                   "हमारा एक समूह है | हम में से कुछ लोग रातों को घूमते हैं और लोगों को डरातें है | हम अधिकतर महिलाओं को अपना निशाना बनाते है | पता करते है की किस गाँव में किससे लोग डरतें  है, हमारे आदमी वैसा ही भेष बदल लेते हैं | महिलाऐं अक्सर डर जाती है | और मानसिक रूप से बीमार हो जाती है | दिमाग सही ढंग से काम नहीं करता है | कभी कभी हमारे आदमी पेड़ों पर चढ़ कर हिलाते हैं | लोग उन्हें भूत समझ जाते है | डर जाते हैं | हम लोग ही भूतों का गलत ढंग से प्रचार करते है| डरा हुआ मनुष्य जैसी भूत की बात सुनता है उसके दिमाग में वैसी ही तस्वीर बनती है|"  
                 सोखा इस से आगे अपनी बात बढा पाते, जनता के सब्र का बाँध टूट गया| जनता उनके ऊपर टूट पड़ी| पीटना शुरू कर दिया| उनमे से कुछ लोग भागना चाहे| लोग उनको भी पकड़ लिए| सोखा और उनके लोग लोग बुरी तरह मार खा रहे थे| जो लोग कुछ नहीं कर पाए, उनने कार को ही अपना निशाना बनाया| सोखा और उसके साथी मार से अधमरे हो गए थे| सबसे बुरी दशा कार की थी| अब पुलिस भी आ गयी थी|
                   चुड़ैल सोखा के गिरफ्त में नहीं आई, लेकिन सोखा जी पुलिस की गिरफ्त में आ गए थे| बहू पूरी तरह ठीक हो गयी थी| कुछ समय पहले शांत समंदर की तरह प्रतीत हो रही जनता अचानक तूफ़ान मचा गयी थी|
                   हम लोग फिर वहाँ से चल दिए| शाम हो चुकी थी| बारात आने का समय हो चुका था|
                   और चुड़ैल.............................................
  •       आशीष यादव 

तुम पर कोई गीत लिखूँ क्या

तुम पर कोई गीत लिखूँ क्या
तुम सुगंध खिलते गुलाब सी
सुन्दर कोमल मधुर ख्वाब सी
मैं मरुथल का प्यासा हरिना
ललचाती मुझको सराब* सी
तुमको पाने की चाहत में
अब तक मचल रही हैं साँसें
तुम ही कह दो तुमको अपने
प्राणों का मनमीत लिखूँ क्या
तुम पर कोई गीत लिखूँ क्या
तुम शीतल हो चंदन वन सी
तुम निर्मल-जल, तुम उपवन सी
तुम चंदा सी और चाँदनी-
सी तुम हो, तुम मलय-पवन सी
नयन मूँद कर तुमको देखूँ
तुम मेरे मन पर छा जाती
कहो नयन-सुख क्या लिक्खूँ मैं
तुमको मन का प्रीत लिखूँ क्या
तुम पर कोई गीत लिखूँ क्या 
*मृग मरीचिका 

आशीष यादव

तुमने उसकी याद दिला दी

जाने अनजाने में कितनी
जिसे सोचते रातें काटीं
लम्हों-लम्हों में किश्तों में
जिनको अपनी साँसें बाटीं
कभी अचानक कभी चाहकर
जिसे ख़यालों में लाता था
और महकती मुस्कानों पर
सौ-सौ बार लुटा जाता था 
उसकी बोली बोल हृदय में
तुमने जैसे आग लगा दी
तुमने उसकी याद दिला दी

अँधियारी रजनी में खिलकर
चम-चम करने लगते तारे
इक चंदा के आ जाने से
फ़ीके पड़ने लगते सारे
शीतल शांत सजीवन नभ में
रजत चाँदनी फैलाता था
तम-गम में भी मेघ-लटों को
खिसकाता औ' मुस्काता था 
यादों पर आवरित घटा को
तुमने जैसे एक हवा दी
तुमने उसकी याद दिला दी 

आशीष यादव

दर्द

ये रातें जल रही हैं,
वो बातें खल रही हैं
लगा दी ठेस तुमने दिल के अंदर
नसें अंगार बनकर जल रही हैं
मौसम सर्द है,
जीवन में लेकिन
लगी है आग,
तन मन जल रहा है।
जिसे उम्मीद से बढ़कर था माना
वही घाती बना है छल रहा है।
तुम्हारी ठोकरों के बीच आकर
बहुत टूटा हुआ हूँ, लुट गया हूँ
तेरा सम्मान खोकर, स्नेह खोकर
स्वयं ही बुझ चुका हूँ, घुट गया हूँ।
यहाँ हालात क्या से क्या हुआ है
नहीं कुछ सूझता निरुपाय हूँ मैं
कहाँ आकर फसा हूँ दलदलों में
विवश लाचार हूँ असहाय हूँ मैं।
इधर दुनिया के ताने मेहनें है
उधर दुनिया मेरी बर्बाद सी है
छिपाऊँ किस तरह से भेद सारे
बनी यह जिंदगी संवाद सी है।
वहीं सूखे से बूढ़े वृक्ष नीचे
सघन छाया में पलना चाहता था
कि जिन उँगली को थामे चल रहा था
उन्हीं के साथ चलना चाहता था।
सभी कुछ रुक गया है जिंदगी में
बची कुछ साँस हैं, कब तक चलेंगीं?
चला तो जाऊँगा मैं छोड़ सब कुछ
मगर यादें मेरी तुझको खलेंगीं।


आशीष यादव

हम-तुम दो तट नदी के

हम तुम
दो तट नदी के
उद्गम से ही साथ रहें हैं
जलधारा के साथ बहे हैं
किन्तु हमारे किस्से कैसे, हिस्से कैसे
सबने देखा, सबने जाना,
रीति-कुरीति, रस्म-रिवाज, अपने-पराये
सब हमारे बीच आये
एक छोर तुम एक छोर मैं
इनकी बस हम दो ही सीमाएं
जब इनमे अलगाव हुआ दुराव हुआ
धर्म-जाति का भेदभाव हुआ
क्षेत्रवाद और ऊँच-नीच का पतितं आविर्भाव हुआ
तब हम तुम
इस जघन्य विस्तार से और दूर हुए
तब भी इन्हें हमने ही हदों में बाँधा

हाय,
हमारा प्यार और ये जगत व्यवहार
दूर से एक दूजे को निहारना, पुकारना
मन ही मन इस सामाजिक व्यवस्था को दुत्कारना
मन में असीम प्यास मिलने की आस लिए
संसार भूल हम दो कूल
आगे बढ़े, समीप आने लगे
फिर वही
रीति-कुरीति, रस्म-रिवाज, अपने-पराये
स्वयं को सिकुड़ते पाये
इस सँकरेपन से पुनः धर्म-जाति क्षेत्रवाद की धारा तेज हुई
मानव और मानवता पर
दानव और दानवता का सैलाब उमड़ा
ये लहरें मानवता की बस्ती लीलने को तैयार हो गई
हम दोनों की तन्द्रा टूटी
ऐसी सामाजिकता, ओछी मानसिकता
डुबो न दे मानव को मानवता को
इसीलिए
मन की असीम प्यास भूल, मिलने की आस भूल
हम फिर से दूर हुए
लहरें शान्त हुईं
हम नही मिलेंगे
क्योंकि हम तो तट हैं
हाँ
साथ बहेंगे साथ रहेंगें
दूर तक
अंत तक 

आशीष यादव

यह सियासत आप पर हम पर कहर होने को है

2122 2122 2122 212

पग सियासी आँच पर मधु भी जहर होने को है।
बच गया ईमान जो कुछ दर-ब-दर होने को है।।

मुफलिसों को छोड़कर गायों गधों पर आ गई।
यह सियासत आप पर हम पर कहर होने को है।।

उड़ रहा है जो हकीकत की धरा को छोड़ कर।
बेखबर वो जल्द ही अब बाखबर होने को है।।

वो जो बल खा के चलें इतरा के घूमें कू-ब-कू।
खत्म उनके हुस्न की भी दोपहर होने को है।।

जुल्म से घबरा के थक के हार के बैठो न तुम।
हो भयावह रात कितनी भी सहर होने को है॥ 

आशीष यादव

वीर अब्दुल हमीद

हम मजा लूटते कितने सुख चैन से
कुछ तो सोचो, मजा पे क्या अधिकार है ?
जो शहादत दिए हैं हमारे लिए
याद उनको करो, ना तो धिक्कार है

अपना कर्तव्य क्या है धरा के लिए
फ़र्ज़ कितना चुकाया है हमने यहाँ
मैं कहानी सुनाता हूँ उस वीर की
खो गया आज है जो न जाने कहाँ

वीरता हरदम ही दुनिया में पूजी जाती है
बन के ज्वाला दुष्टों के हौसले जलाती है
ऐसी ही वीरता की गाथा आज गाता हूँ
वीर अब्दुल हमीद की कथा सुनाता हूँ
जिला ग़ाज़ीपुर में है धामूपुर ग्राम, सुनो
जन्मा था नाहर, था हमीद जिसका नाम, सुनो
ईसवी उन्नीस सौ तैंतीस पहली जुलाई थी
शुभ घड़ी ये उस्मान फ़ारूक़ के घर आई थी
 
मैंने माना तुमने माना सारी दुनिया मानी
हिन्द देश का रहने वाला था कोई तूफानी
जो था सच्चा हिंदुस्तानी, जो था सच्चा हिंदुस्तानी

दादी कहती, "बेटा, घर के काम काज कुछ सिखले"
कहता बालक," फउज में जाईब, दादी बात तू बुझ ले"
बचपन से ही हिन्द देश से जुड़ गया था रूहानी
हिन्द देश का रहने वाला था कोई तूफानी
जो था सच्चा हिंदुस्तानी, जो था सच्चा हिंदुस्तानी


नाम हमीद देशभक्ति का सपना जिसको भाया
बाँध कफ़न सिर घर से कर ज़िद सेना में वो आया
खाया कसम कि दे दूँगा मैं देश को अपनी जवानी
हिन्द देश का रहने वाला था कोई तूफानी
जो था सच्चा हिंदुस्तानी, जो था सच्चा हिंदुस्तानी

सेना में आकर हमीद ऐसे करतब दिखलाता
पहले से ही है ये प्रशिक्षित सबको भ्रम हो जाता
वीर जाँबाज जो बना हुआ था सबके लिए कहानी
हिन्द देश का रहने वाला था कोई तूफानी
जो था सच्चा हिंदुस्तानी, जो था सच्चा हिंदुस्तानी

जो होके जवान निज देश को दिया न कुछ
उसकी जवानी पे जवानी खुद रोती है
प्रेम-पाश में ही फँसा रहा महबूब के
वो क्या जाने जवानी की रवानी कैसी होती है
*आठ साल बीते जब चीन से लड़ा हमीद
दिखला दिया कि ये जवानी कैसी होती है
रुक नही सकती ये बाँध जैसा बांध लो जी
राह ढूँढ लेगी बहते पानी जैसी होती है

जो अशांति खातिर जन्मा शांति से न रह पायेगा
दिन-रात तबाही सोचेगा पर खुद तबाह हो जाएगा
पाकिस्तान सन पैंसठ में ये जुमला सच कर दिखलाया
निज भाई से ही लड़ बैठा और भारी मुँह की भी खाया

सितंबर सन पैंसठ की बेला
पाक ने क्रूर खेल जब खेला

दन-दन लगा दागने गोला
अब्दुल जोश में जय-हिन्द बोला

पैंटुन टैंक अमरिका वाला
बना अभेद अचूक निराला

ज्वाला बरस रही थी बाहर
भिड़ने चला टैंक से नाहर

शोला उमड़ पड़ा था रण में
पहला टैंक उड़ाया क्षण में
बनकर अग्नि-पुञ्ज का झोंका
पैंटुन टैंक दूसरा रोका
आया एक दहकता गोला
ऊपर गिरा शेर के शोला
तीसरा टैंक निकट तब आया
मारा खण्ड-खण्ड छितराया

तब,
जान बचाकर लगे भागने गीदड़ पाकिस्तानी
हिन्द देश का रहने वाला था कोई तूफानी
जो था सच्चा हिंदुस्तानी, जो था सच्चा हिंदुस्तानी

दस सितंबर की यह घटना सन पैंसठ की जंग
देख हौसला एक वीर का हुआ जमाना दंग
चक्र-परमवीर **सात दिनों के भीतर ही वह पाया
तन अर्पण कर मातृभूमि को अब्दुल वीर कहाया

दे आशीष, मैं लिखूं वीरता हे शारदा  भवानी
हिन्द देश का रहने वाला था कोई तूफानी
जो था सच्चा हिंदुस्तानी, जो था सच्चा हिंदुस्तानी
* 1954 में अब्दुल हमीद भारतीय सेना में भर्ती हुए।  आठ साल के दौरान ही चीन से युद्ध जिसमे बहादुरी के लिए सैन्य सेवा मेडल, समर सेवा मेडल एवं रक्षा मेडल दिया गया।
** दस सितंबर 1965 को शहीद वीर को 16 सितंबर 1965 को ही परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। 

©आशीष यादव

हाँ तुम सपने में आई थी

हाँ तुम सपने में आई थी 
होठों की पंखुड़ी सजाये
बालों के बादल लहराए
गालों पर लालिमा सुबह की
माथे पर बिंदिया चमकाए
जब तुमको मैंने देखा तो
पास खड़ी तुम मुस्काई थी
हाँ तुम सपने में आई थी 
यौवन का शृंगार सलोना
मुग्ध-मुदित सा मन का कोना
देह सुगन्धित अरब इत्र सी
साँसों का फिर ख़ुशबू होना
थामा मेहंदी के हाथों को,
अजब अदा से बलखाई थी
हाँ तुम सपने में आई थी 
तुमको अपने पास बिठाया
मैने इक अरमान सजाया
तुम्हे देखने की चाहत में
बाकी का संसार भुलाया
जब तेरे घूँघट को टारा
सीने से लग शरमाई थी
हाँ तुम सपने में आई थी

आगे अधरों का प्याला था
यौवन का मधुमय हाला था
इनको पाने की चाहत में
आलिंगन करने वाला था
ज्यों ही इन पर होंठ रखे, बस...
नींद खुली फिर तन्हाई थी
हाँ तुम सपने में आई थी 


आशीष यादव

तुम मुझको कितना भाती हो

कैसे मै बतलाऊँ तुमको,
तुम मुझको कितना भाती हो|

जैसे ये मनमोहक सावन,
जैसे पवन बसन्ती पावन,
जैसे उर मे बस जाती है
हरी-भरी यह धरा लुभावन,

तुम इस भाँति लुभा जाती हो,

कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो|

जैसे वात मलयजी डोले,
जैसे पेंग भरे हिंडोले,.
जैसे ताँक-झाँक करने को ,.
चंदा घन-वातायन खोले..

मेरे हृदय समा जाती हो ,

कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो|

ज्यों प्राची मे सुबह की लाली,
बौराये आमों की डाली ,
जैसे चलती उतान होकर ,
नदी कोई अल्हड़ मतवाली ,

ऐसे मुझ-पर छा जाती हो ,

कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो|

ज्यों जाड़ो मे धूप निकलती ,
पर्वत से ज्यों बर्फ पिघलती,
जैसे पतझड़ के जाने पर ,
नई-नई कोंपलें निकलती,

अद्भुत, मन हर्षा जाती हो ,

कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो|

चिर-दिनों तक तुम हो मेरी

चिर-दिनों तक तुम हो मेरी,
युगों युगों तक रहूँ तुम्हारा|
इक दूजे से अलग नही हम,
जनम-जनम तक साथ हमारा|

जितनी मर्जी उतना रुठो,
जितना मन हो रहो बेखबर,
तुम्हे मनाऊँ चिर-जीवन तक,
बिछड़न तुमसे नही गँवारा|

आस मेरी तुम साँस मेरी तुम,
तुम ही मेरे दिल की धड़कन,
अब तो सबकुछ तुम ही मेरी,
नजरों को बस तुम्ही नजारा|

तुमको चाहूँ तुम्हे सराहूँ,
तेरे ही बारे मे सोचूँ,
उस जीवन को भूल गया हूँ,
जो कुछ तेरे बिना गुजारा| 

आशीष यादव

दोहे

पिय बिन चित चंचल रहे, सावन जारे देह।
बूँद बढ़ाये अगन को, विरहिणि बिछुड़ा नेह।।

बिरहा ढोला लोरिकी, चैती को नही मान।
नंगी धुन पर नाचता, पूरा हिन्दुस्तान ।।

माता जी मम्मी भईं, हुए पिता जी डैड।
यह संस्कृति नंगी हुई, हिन्दुस्तानी मैड।।

क्या था अभिनय भूलकर, आज दिखाते जिस्म।
मजबूती से फाँसता, अश्लीलता तिलिस्म।। 

आशीष यादव

सरिता

हे शान्त स्निग्ध जल की धारा

तुम कलकल कलरव की हो गान
हो लिपटे बेलों की वितान
तुम वसुन्धरा की शोभा हो
हे आन मान सरिता महान
तुझमे दिखता जीवन सारा
हे शान्त स्निग्ध जल की धारा

तुझमे निज-छवि लखते उडगन
यह विम्ब देख हर्षाता मन
सुषमा ऐसी नयनों मे बसा
रहता बस मे किसका तन मन
दिखता तुझमे चन्दा प्यारा
हे शान्त स्निग्ध जल की धारा

हे मिट्टी की सोंधी सुगन्ध
बाँधे सबको जो पाश-बन्ध
तुम अद्भुत और अलौकिक हो
बाँधेगा तुमको कौन छन्द
छन्दों का नही ऐसा कारा
हे शान्त स्निग्ध जल की धारा

हे रश्मि-प्रभा मे श्वेत जाल
अनुपम मनोहारी चन्द्रभाल
उर्वशी रेणुका सी लगती
(तुम स्वयं अप्सरा सी लगती)
यौवन धारे कंचुक विशाल
वह तुमसे कौन नही हारा
हे शान्त स्निग्ध जल की धारा

आशीष यादव

एक पैग (कहानी)

बटेश्वरनाथ गाँव के सबसे बड़े आदमी हैं। भगवान का दिया हुआ सबकुछ है उनके पास। माता पिता अभी सलामत हैं। दो लड़के और एक लड़की भी है। बड़ा लड़का गटारीनाथ ८ साल का है। लड़की सुनयनी ६ साल की और सबसे छोटा लड़का मेहुल नाथ अभी ३ साल का है जिसे प्यार से सब मेल्हू कहते हैं।
 बटेश्वरनाथ के पिता कोई ३ साल पहले रिटायरमेन्ट लिये थे जब मेल्हू का जन्म हुआ था। रिटायरमेन्ट के समय खूब सारा पैसा भी मिला था। ये लोग खानदानी रईस भी थे। बटुकनाथ के पिता बहुत सारा पैसा छोड़ गये थे। इनके परिवार की खूबियाँ बहुत हैं। सबसे प्रेम मोहब्बत, गाँव वालों से मैत्री भाव, विनम्रता इत्यादि सभी गुण विद्यमान हैं।
आज बटेश्वरनाथ के अजीज मित्र झुण्डारीचन्द के बेटे का जन्मदिन है। बेटे के जन्मदिन की खुशी मे झुण्डारीचन्द ने बहुत शानदार दावत का प्रबन्ध किया है। सभी दोस्तों एवँ गाँव वालों को खाने पर बुलाया है। सबकुछ बहुत शानदार और सलीके से चल रहा है। थोड़ी देर बाद सब लोग खाकर चले जाते हैं। बस बटेश्वरनाथ और कुछ अन्य मित्र बचते हैं। फिर इनके खाने का इन्तज़ाम होता है। सभी मित्रगण खाने बैठते हैं। झुण्डारीचन्द का छोटा भाई खाना परोस रहा है।
पत्तलों मे तरह तरह के पकवान। भरपेट खाया आदमी भी देखे तो एकबार खाने बैठ जाय। सभी दोस्तों के आगे गिलास मे व्हिस्की भी है और दो पैग का दौर चल चुका है। बटेश्वरनाथ मद्यपान नही करते हैं लेकिन आज कुछ और होने वाला है।
हेङ्गुरदास एक और व्हिस्की गिलास मे डालते हुए बटेश्वरनाथ की तरफ बढ़ाते हैं। बटेश्वर जी बड़े विनम्रता से मना करते हैं परन्तु सभी दोस्तों के कहने पर एक पैग को तैयार हो जाते हैं। हेंगुरदास मझे हुए मद्य परोसक हैं। वो बटेश्वरनाथ का पैग थोड़ा कड़ा बनाते हैं। कुछ देर मे भोजन करते हुए और थोड़ा थोड़ा मुहँ बनाते हुए बटेश्वरनाथ पुरा गिलास गटक जाते हैं।
पार्टी खत्म हो चुकी है। सप्तर्षि भी ऊपर उठ आये हैं। कोई ११ बजे का वक्त है। सभी दोस्त विदा लेते हैं। बटेश्वरनात घर आते हैं और बारामदे मे रखे बसहटे पर सो जाते हैं। गजब की सुहावनी रात। आज तक कभी ऐसी नींद नही आयी थी। आराम आराम और बस आराम। नींद भी ऐसी जैसे लखिया सेज पर सोये हों।
रात बीत गयी है। सभी तारे प्रतापी सूरज के प्रभाव से तेजहीन एवँ अदृश्य हो गये हैं, केवल शुक्र अपनी महिमा बचाने की जद्द्जहद मे है। गाँव के सभी लोग जग गये हैं और पशुओं को नाद पर लगाकर चारापानी डाल रहे हैं। सुनयनी पापा कहते आती है और बटेश्वर का हाथ पकड़कड़ हिलाती है। बटेश्वर ऊँघते हुए उठते हैं। देखते हैं सुबह हो गयी है। उनके पशू (पशु का बहुवचन) अभी नाद पर नही लगे हैं। यह पहली बार हो रहा है जब बटेश्वरनाथ सभी तारों के बाद जगे हों। वो जल्दी से पशुओं को चारापानी कर के खेत की तरफ चल देते हैं। जल्दी से नित्य काम निपटाते हें।
खेत मे गेहूँ की फसल पक गयी है। कटिया का समहुत (श्रीगणेश) भी नही हुआ है। बटेश्वरनाथ कटिया-दवँरी (कटाई-मड़ाई) का कुछ काम बनिहारों से करवाते हैं और कुछ हार्वेस्टर से। कल सोमवार है, दिन शुभ है। अतः वो आज बनिहारों को कहने निकल जाते है।
पुरे दिन आज वो बनिहारों के साथ रहे। सब कुछ देखना भी तो पड़ता है कि सब कर्पा सही से धर रहे हैं कि नही, छींट तो नही रहे हैं, ज्यादा बाल तो नही टूट रही है। शाम तक बनिहारों के साथ थक जाते हैं। घर जाते समय मुलाकात झुण्डारीचन्द से होती है, फिर बातें शुरू। बटेश्वरनाथ रात कि निंद का जिक्र करते हैं। झुण्डारीचन्द सब राज खोल देते हैं कि व्हिस्की का एक पैग सारी थकान मिटा देता है। फिर अच्छी नींद आती है। सुबह फिर से वही तरोताजगी रहती है।
बटेश्वरनाथ कटिया-दँवरी से निकल चुके हैं लेकिन शाम को व्हिस्की का एक पैग आदत हो चुकी है।
धान रोपाई का आज समहुत था। बटेश्वरनाथ कुछ ज्यादा थक गये थे। एक पैग पीने बैठे तो कुछ ज्यादा ही पी लिए, चढ़ गई। सुकपोला भोजन को कहने लगी तो बटेश्वरनाथ की आवाज लटपटा रही थी। पीने के सन्दर्भ मे कहने लगी, "काहे एतना पीते हैं?" इतना सुनते ही बटेश्वरनाथ का गुस्सा फूट जाता है," इ हमरी मेहर होके हमको सिखायेगी, दिन भर खेत मे हम मरते हैं।" और भी बहुत कुछ कहने लगते हैं। सुनयना और मेल्हू तो अभी सो गये हैं लेकिन गटारी अभी जाग रहा था और बाबा से कहानी सुन रहा था। जब बटुकनाथ सुनते हैं तो उठकर आते हैं। उनके पूरे जीवन मे यह पहली बार है जब इस तरह की कोई घटना उनके घर घटी हो। बटुकनाथ पहले से ही जानते थे कि बटेश्वरनाथ पीने लगा है लेकिन एक तो इकलौता दुलारा था दुसरे पूरे घर को सम्हालता था। खेतों का काम करता और करवाता था। अतः सोचते थोड़ा सा पीकर इसे आराम हो जाता है तो कोई बात नही। लेकिन आज तो हद हो गई। एक महाभारत के बाद वो रात शान्त हुई। फिर सुबह, नई सुबह। सब कुछ फिर से ठीक ढ़ंग से, लेकिन बटेश्वरनाथ को रात की बात बिल्कुल याद नही थी।
बटेश्वरनाथ थोड़ा देर से जगते हैं लेकिन खेत पर चले जाते हैं। लेव लगवाकर घर आते हैं और नाश्ता करते हैं। बनिहार आकर बियड़ा से धान लगाने के लिये उखाड़ रहे हैं। कुछ देर बाद बटेश्वरनाथ खेत की ओर चल देते हैं। फिर वही मेहनत, थकान फिर रात मे पैग। आज बटेश्वरनाथ होश मे रहते हैं फिर भी पिता बटुकनाथ को पीने की बात अखरती है कि क्यों नही वो मना कर पाते हैं।
कुछ समय बीतता है। फिर चेखुर के जन्मदिन की पार्टी होती है। अबकी पैग का आग्रह नही करना पड़ता है सबको। इस बार भी हेंगुरदास ही पैग बनाते हैं। बटेश्वरनाथ खुशी-खशी सबसे अधिक पीते हैं। और पार्टी के अन्तिम दौर मे नाचने लगते हैं। गमछा को सिर पर ओढ़कर उसका घूँघट बनाते हुए कभी लाचारी तो कभी फगुआ शुरू करते हैं, और बड़ी अदा से कमर लचकाते हुए एक पैर के सहारे नृत्य शुरू करते हैं। तकरीबन साढ़े बारह बजे विदाई होती है। विदाई के समय बटेश्वरनाथ सभी दोस्तों मे अपने सबसे छोटे पुत्र मेहुल का जन्मदिन मनाने की घोषणा करते हुए१७ अप्रैल को सबको निमन्त्रित कर देते हैं।
कटियाँ दँवरी का काम खचाखच लगा है किन्तु बटेश्वरनाथ अपने वादे को याद रखे हैं। समाज मे परिवार की ऊँची नाक है, उसे और ऊँचा बनाने के लिये बटेश्वरनाथ बहुत ही अच्छी दावत का इन्तजाम करते हैं। पूरा गाँव निमन्त्रित है। हर चीज का प्रबन्ध है। कहीं से कोई कमी नही है। झुण्डारीचन्द की हर व्यवस्था से ऊँची व्यवस्था है।
लोग पाँतों मे बैठ के खा रहे हैं। हर तरह का पकवान सभी लोगों तक पहुँच रहा है। जिसका जो मन करे, जितना मन करे, हींक भर खाए। कोई मनाही नही। अब गाँव वालों के खाने का दौर खत्म हो गया है। केवल मित्रगण बाकी हैं। वो लोग भी खाने बौठते हैं। फिर वही सब शुरू। भोजन शुरू होने से पहले ही दो पैग चल चुका है। गुनगुने नशे मे भोजन शुरू होता है। बातचीत मे बड़ाई इतनी होती है कि बटेश्वरनाथ फूले नही समाते। अचानक एक मित्र उस पार्टी की तुलना झुण्डारीचन्द की पार्टी से करते हुए श्रेष्ठ बताते हैं। इधर कुछ नशे की हालत और कुछ मजाक मे बटेश्वरनाथ भी झुण्डारीचन्द की हिनाई कर देते हैं। फिर क्या। देखते देखते मित्रगण दो खेमो मे बट जाते हैं। नशा अपना रंग दिखाता है और बात तू तू- मै मै तक आ जाती है। भारी हंगामा मचता है। बिचारे बटुकनाथ किसी तरह शान्त कराने की कोशिश करते हैं, लेकिन सारे प्रयास विफल प्रतीत होते हैं। झुण्डारीचन्द बटुकनाथ के पैर तो पकड़ते हैं लेकिन बटेश्वरनाथ को गाली भी देते हैं। साफ प्रतीत होता है कि नशा हावी है। अन्त मे झुण्डारीचन्द का खेमा पार्टी का बहिष्कार करता है और भविष्य मे बटेश्वरनाथ के खेमे से किसी भी तरह का सम्बन्ध न रखने की कसम खाता है।
छः साल बीत गये हैं। बटुकनाथ को मरे ढ़ाई साल हो गये। पिता जी की पेन्शन खत्म है। बटेश्वरनाथ को केवल कृषि का ही आसरा है किन्तु बटेश्वरनाथ मे पहले से ज्यादा कुछ रईसी आ गयी है। अब हर शाम को कुछ पीने वाले उनके दरवाजे पर बैठते हैं। फिर बटेश्वरनाथ की तारीफ तो कभी उनके बच्चों की तारीफ। बटेश्वरनाथ प्रसन्न होते हैं। फिर पैगों का दौर शुरू होता है। फिर रात। सुबह, दोपहर फिर शाम को शुरू। रईसी बरकरार रखने हेतु धीरे-धीरे सभी मवेशी बिक चुके हैं। बस एक भैस है जो एक टाईम एक डेढ़ किलो दूध देती है। वो भी खटारा हो चुकी है।
समय बीतता है। पीने पिलाने व रईसी बरकरार रखने के चक्कर मे बटेश्वरनाथ की चल सम्पत्ति  चली गई है, लेकिन अचल सम्पत्ति बहुत है। एक दिन शाम को बोतल खत्म होने के बाद कोई पियक्कड़ मित्र बैंक से लोन लेने की बात करता है। फिर क्या। जमीन को दिखाकर बटेश्वरनाथ लोन लेते हैं। फिर वही पीना-पिलाना।
अब तो सुकपोला से झगड़े भी दिनचर्या के अंग बन चुके हैं। पीने के बाद पूरे गाँव कि माँ-बहन एक करना भी शुरू कर दिया बटेश्वरनाथ। धीरे-धीरे लोगों का ुनके दरवाजे आना बन्द हो गया। लोन की कोई भी किश्त समय पर न दे पाने की वजह से बैंक ने उनकी सम्पति ले ली थी। अब बटेश्वरनाथ को किसी चीज की सुधि न रहती। झूठ बोलकर शाम के पैग का किसी तरह जुगाड़ करना। बात व्हिस्की से देशी नूरी (देशी शराब) पर आ गयी थी। वो भी समय पर न मिलती, बटेश्वर पागल हो उठता।
आज होली है। बटेश्वर को कई दिन से दारू सूँघने को भी नही मिली है। प्रधान जी के घर से शुरुआत होती है। बटेश्वर को लगता है जैसे बरसों की प्यास बुझ रही है। जम के पीता है। कहीं व्हिस्की, कहीं भाँग, कहीं रम तो कहीं ठर्रा, जो भी मिला बस पीते गया।
दो- ढाई का वक्त है। होली-फगुआ गाने वालों की टोली सबके दरवाजे गा रही है। लोग झूम के गा रहे हैं। नाच रहे हैं। अचानक गाँव का एक लड़का ढिभर एक आदमी के सनहना मे गिरे होने की खबर देता है। लोग भागे-भागे उधर जाते हैं। पूरा शरीर बास मार रहा है। कुछ शराब की दुर्गन्ध तो कुछ नाले की। दो लड़के खींचकर बाहर लाते हैं। गटारी अपने बाप की यह स्थिति देखकर दूसरी ओर चला जाता है। लोग अब भी वहाँ जुटे हैं। मक्खियाँ घेर रखीं हैं बटेश्वर को। सुकपोला खूब रो रही है और बटेश्वर को भगवान से उठा लेने की दुहाई दे रही है। एक लड़का दूर से ही बाल्टी का पानी बटेश्वर के शरीर पर फेंक रहा……………………………..
आशीष यादव