शुक्रवार, 18 जून 2021

जागरण गीत

 पूरब में जगी है भोर, पंछी करने लगे है शोर,

मुसाफिर तू भी जग जा, हो मुसाफिर तू भी जग जा,


जग जाएगा तो पायेगा जग में सुन्दर अमुल खजाना,
सोकर खोकर समय चूकि फिर रह जाए पीछे पछताना .
समय के रहते जाग, कि अपना हिस्सा ले तू आज,
मुसाफिर तू भी जग जा, हो मुसाफिर तू भी जग जा,

अपना सब कुछ दे देने को खड़े ये देखो पेड़ सयाने,
लेने की तो कोशिश कर तू पूरा मिलेगा सोलह आने.
लूट सके तो लूट, मिली है आज ये पूरी छूट,
मुसाफिर तू भी जग जा, हो मुसाफिर तू भी जग जा,

देख लुटाने को सूरज अब खोल रहा है अपना पिटारा,
पाने की तू कोशिश कर ले, पा जाएगा तू भी सितारा.
कोशिश से ले ले आज, वरना रह जाएगा राज़,
मुसाफिर तू भी जग जा, हो मुसाफिर तू भी जग जा,

अनवरत ये चलती नदिया, कह रही है चलता जा,
काम अभी तू कर ले अपना आगे का है भरोषा क्या?
श्रम से मिलता सुख, जो सोये पता है वो दुःख.
मुसाफिर तू भी जग जा, हो मुसाफिर तू भी जग जा,
हाँ हाँ मुसाफिर तू भी जग जा......