अकेले तुम नहीं यारा
तुम्हारे साथ और भी बात
मुझे हैं याद
कि जैसे फूल खिला हो
तुम हसीं, बिलकुल महकती सी
चहकती सी
मृदुल किरणों में धुलकर आ गई
और छा गई
जैसे कि बदली जून की
तपती दोपहरी से धरा को छाँव देती
ठाँव देती हो मुसाफिर को
कि जैसे झील हो गहरी
कि ये भहरी निगाहें
काजलों की कोर ये खीँचे मुझे
भींचे कि जैसे
हार सी बाहें गले में डालकर
और ढाल कर खुद में मुझे
तुम प्यार देती
वार देती थी स्वयं को
मेरी जानाँ,
मुझे है याद वह भी
कि तेरी जुल्फें लहरकर
बादलों का रूप लेतीं
और देती प्यार की बूंदें
कि जिनमें भीगकर
तन तर हो जाता
और पाता स्नेह-
सुख उर में समाता
याद है हाँ
हाँ याद है
पूरब में अंगड़ाई लिए
सूरज की लाली से तुम्हारे होंठ
कि जिनसे लिपटकर खेलती मेरी तमन्ना
और तुम हँसती हुई
कोमल गुलाबों को मेरे होठों पे रखती
और मैं आनंद का परिपाग पाता
भीग जाता
याद है
हाँ याद है।
आशीष यादव
तुम्हारे साथ और भी बात
मुझे हैं याद
कि जैसे फूल खिला हो
तुम हसीं, बिलकुल महकती सी
चहकती सी
मृदुल किरणों में धुलकर आ गई
और छा गई
जैसे कि बदली जून की
तपती दोपहरी से धरा को छाँव देती
ठाँव देती हो मुसाफिर को
कि जैसे झील हो गहरी
कि ये भहरी निगाहें
काजलों की कोर ये खीँचे मुझे
भींचे कि जैसे
हार सी बाहें गले में डालकर
और ढाल कर खुद में मुझे
तुम प्यार देती
वार देती थी स्वयं को
मेरी जानाँ,
मुझे है याद वह भी
कि तेरी जुल्फें लहरकर
बादलों का रूप लेतीं
और देती प्यार की बूंदें
कि जिनमें भीगकर
तन तर हो जाता
और पाता स्नेह-
सुख उर में समाता
याद है हाँ
हाँ याद है
पूरब में अंगड़ाई लिए
सूरज की लाली से तुम्हारे होंठ
कि जिनसे लिपटकर खेलती मेरी तमन्ना
और तुम हँसती हुई
कोमल गुलाबों को मेरे होठों पे रखती
और मैं आनंद का परिपाग पाता
भीग जाता
याद है
हाँ याद है।
आशीष यादव
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