यहाँ एक बेटी चली नाँव लेके
करेगी नदी पार कैसे? निरेखे
खिवैया स्वयं है बड़ा फासला है
भुजाएँ बली हैं बड़ा हौसला है
इसी हौसले के सहारे चली है
हवाएँ दिशाएँ सवारें चली है
चली ज्ञान की ज्योति लाने चली है
बहाने फसाने जलाने चली है
चली ज्ञान गंगा बहाने चली है
पुराने रिवायात ढाने चली है
नई जंग को जीत जाने चली है
नया पाठ जैसे पढ़ाने चली है
चलो सीख लो तोड़ दो रूढ़ियों को
पढ़ाओ लिखाओ चलो बेटियों को
पढ़ेगीं लिखेंगीं उजाला करेंगीं
बुरे वक़्त में ये सँभाला करेंगीं
अशीष यादव
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