स्वयं को आजमाने को तू खुलकर आ जमाने में
बहुत अनमोल है जीवन गवाँता क्यों बहाने में
बहुत अनमोल है जीवन गवाँता क्यों बहाने में
नदी के पास बैठा है दबा के प्यास बैठा है
तुझे मालूम है, तुझमें कोई एहसास बैठा है
किनारे कुछ न पाओगे मिलेगा डूब जाने में
तुम्हारे सामने दुनियाँ सुनो रणभूमि जैसी है
स्वयं का तू ही दुश्मन है स्वयं का तू हितैषी है
कहीं पीछे न रह जाना स्वयं से ही निभाने में
कहाँ दसरथ की दौलत राम जी के काम आती है
सदा बाहें स्वयं की राह के काटें हटाती हैं
स्वयं के बाहुबल से काम ले राहें बनाने में
जगा दे मन का बजरंगी जला दे आलसी लंका
दिखा दे जोर पौरुष का बजा दे विश्व में डंका
पड़ा विपदाओं का सागर भला है लाँघ जाने में
विचारों के महा-रण में स्वयं अर्जुन-कन्हैया बन
पड़ी मझधार में नैया स्वयं का तू खेवैया बन
स्वयं ही शस्त्र बन जा तू स्वयं को जीत जाने में
आशीष यादव
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