शुक्रवार, 20 दिसंबर 2019

हाँ तुम सपने में आई थी

हाँ तुम सपने में आई थी 
होठों की पंखुड़ी सजाये
बालों के बादल लहराए
गालों पर लालिमा सुबह की
माथे पर बिंदिया चमकाए
जब तुमको मैंने देखा तो
पास खड़ी तुम मुस्काई थी
हाँ तुम सपने में आई थी 
यौवन का शृंगार सलोना
मुग्ध-मुदित सा मन का कोना
देह सुगन्धित अरब इत्र सी
साँसों का फिर ख़ुशबू होना
थामा मेहंदी के हाथों को,
अजब अदा से बलखाई थी
हाँ तुम सपने में आई थी 
तुमको अपने पास बिठाया
मैने इक अरमान सजाया
तुम्हे देखने की चाहत में
बाकी का संसार भुलाया
जब तेरे घूँघट को टारा
सीने से लग शरमाई थी
हाँ तुम सपने में आई थी

आगे अधरों का प्याला था
यौवन का मधुमय हाला था
इनको पाने की चाहत में
आलिंगन करने वाला था
ज्यों ही इन पर होंठ रखे, बस...
नींद खुली फिर तन्हाई थी
हाँ तुम सपने में आई थी 


आशीष यादव

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