हे शान्त स्निग्ध जल की धारा
तुम कलकल कलरव की हो गान
हो लिपटे बेलों की वितान
तुम वसुन्धरा की शोभा हो
हे आन मान सरिता महान
तुझमे दिखता जीवन सारा
हे शान्त स्निग्ध जल की धारा
तुझमे निज-छवि लखते उडगन
यह विम्ब देख हर्षाता मन
सुषमा ऐसी नयनों मे बसा
रहता बस मे किसका तन मन
दिखता तुझमे चन्दा प्यारा
हे शान्त स्निग्ध जल की धारा
हे मिट्टी की सोंधी सुगन्ध
बाँधे सबको जो पाश-बन्ध
तुम अद्भुत और अलौकिक हो
बाँधेगा तुमको कौन छन्द
छन्दों का नही ऐसा कारा
हे शान्त स्निग्ध जल की धारा
हे रश्मि-प्रभा मे श्वेत जाल
अनुपम मनोहारी चन्द्रभाल
उर्वशी रेणुका सी लगती
(तुम स्वयं अप्सरा सी लगती)
यौवन धारे कंचुक विशाल
वह तुमसे कौन नही हारा
हे शान्त स्निग्ध जल की धारा
आशीष यादव
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