कैसे मै बतलाऊँ तुमको,
तुम मुझको कितना भाती हो|
जैसे ये मनमोहक सावन,
जैसे पवन बसन्ती पावन,
जैसे उर मे बस जाती है
हरी-भरी यह धरा लुभावन,
तुम इस भाँति लुभा जाती हो,
कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो|
जैसे वात मलयजी डोले,
जैसे पेंग भरे हिंडोले,.
जैसे ताँक-झाँक करने को ,.
चंदा घन-वातायन खोले..
मेरे हृदय समा जाती हो ,
कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो|
ज्यों प्राची मे सुबह की लाली,
बौराये आमों की डाली ,
जैसे चलती उतान होकर ,
नदी कोई अल्हड़ मतवाली ,
ऐसे मुझ-पर छा जाती हो ,
कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो|
ज्यों जाड़ो मे धूप निकलती ,
पर्वत से ज्यों बर्फ पिघलती,
जैसे पतझड़ के जाने पर ,
नई-नई कोंपलें निकलती,
अद्भुत, मन हर्षा जाती हो ,
कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो|
तुम मुझको कितना भाती हो|
जैसे ये मनमोहक सावन,
जैसे पवन बसन्ती पावन,
जैसे उर मे बस जाती है
हरी-भरी यह धरा लुभावन,
तुम इस भाँति लुभा जाती हो,
कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो|
जैसे वात मलयजी डोले,
जैसे पेंग भरे हिंडोले,.
जैसे ताँक-झाँक करने को ,.
चंदा घन-वातायन खोले..
मेरे हृदय समा जाती हो ,
कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो|
ज्यों प्राची मे सुबह की लाली,
बौराये आमों की डाली ,
जैसे चलती उतान होकर ,
नदी कोई अल्हड़ मतवाली ,
ऐसे मुझ-पर छा जाती हो ,
कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो|
ज्यों जाड़ो मे धूप निकलती ,
पर्वत से ज्यों बर्फ पिघलती,
जैसे पतझड़ के जाने पर ,
नई-नई कोंपलें निकलती,
अद्भुत, मन हर्षा जाती हो ,
कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो|
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