शुक्रवार, 20 दिसंबर 2019

तुम मुझको कितना भाती हो

कैसे मै बतलाऊँ तुमको,
तुम मुझको कितना भाती हो|

जैसे ये मनमोहक सावन,
जैसे पवन बसन्ती पावन,
जैसे उर मे बस जाती है
हरी-भरी यह धरा लुभावन,

तुम इस भाँति लुभा जाती हो,

कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो|

जैसे वात मलयजी डोले,
जैसे पेंग भरे हिंडोले,.
जैसे ताँक-झाँक करने को ,.
चंदा घन-वातायन खोले..

मेरे हृदय समा जाती हो ,

कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो|

ज्यों प्राची मे सुबह की लाली,
बौराये आमों की डाली ,
जैसे चलती उतान होकर ,
नदी कोई अल्हड़ मतवाली ,

ऐसे मुझ-पर छा जाती हो ,

कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो|

ज्यों जाड़ो मे धूप निकलती ,
पर्वत से ज्यों बर्फ पिघलती,
जैसे पतझड़ के जाने पर ,
नई-नई कोंपलें निकलती,

अद्भुत, मन हर्षा जाती हो ,

कैसे मै बतलाऊँ तुमको
तुम मुझको कितना भाती हो|

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