शुक्रवार, 20 दिसंबर 2019

दोहे

पिय बिन चित चंचल रहे, सावन जारे देह।
बूँद बढ़ाये अगन को, विरहिणि बिछुड़ा नेह।।

बिरहा ढोला लोरिकी, चैती को नही मान।
नंगी धुन पर नाचता, पूरा हिन्दुस्तान ।।

माता जी मम्मी भईं, हुए पिता जी डैड।
यह संस्कृति नंगी हुई, हिन्दुस्तानी मैड।।

क्या था अभिनय भूलकर, आज दिखाते जिस्म।
मजबूती से फाँसता, अश्लीलता तिलिस्म।। 

आशीष यादव

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