ऋतु शीत रवानी में अपने
ऊर्ध्वगी जवानी में अपने
चहुँओर सर्द को बढ़ा रही
जीवन वह्निः तक बुला रही
थी जगह जगह जल रही आग
प्रमुदित होकर जन रहे ताप
कौड़े में जैसे उठी ज्वाल
मन मोह लिया इक अधर लाल
रति जैसी जिसकी छाया थी
वह थी समक्ष या माया थी
पहने थे वसन तरीके से
सब सज्जित स्वच्छ सलीके से
कुंतल को उसने झटक दिया
मनसिज प्रसून पर पटक दिया
कितने उद्गार उठे मन में
ताड़ित से कौंध रहे तन में
मन हुआ अनोखा गीत लिखूँ
मै एक दहकती शीत लिखूँ
पर सोच रहा था यदि गीत
कविता लेखन है कर्म मेरा
तो क्या जिस पर लिख रहा
स्वीकृति लेना उससे है धर्म मेरा?
इस पर सोचूँगा और कभी
हे नाथ करूँगा गौर कभी
मैं अभी आपसे बस उसका
व्यवहार जानने आया हूँ
लिख सकूँ गीत उसके ऊपर
अधिकार माँगने आया हूँ
आशीष आशीष
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