212 212 212 212
कुछ ने हामी भरी तीरगी के लिए
कुछ जले शौक़ से रौशनी के लिए
ख़ुद से मिलने की चाहत ने मुझ से कहा
आईए बैठिए दो घड़ी के लिए
मज़हबों का ये खेला ख़तरनाक है
इसमें कोई नहीं है किसी के लिए
मैंने देखा नहीं कोई भी देवता
(कौन अल्लाह भगवान या देवता)
माँ मिली है मुझे बंदगी के लिए
कितने लाचार हो मुफ़लिसी ने कहा
कोई मिलता नहीं दोस्ती के लिए
हम लिखें हुस्न पर? हुंह! अजी छोड़िए
हैं ज़मीन और भी शाइरी के लिए
आशीष यादव
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