मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

जिंदगी में तुम्हारी कमी रह गई

 मुझको क्या ना मिला जिंदगी में यहाँ 

पर कहीं आंख में इक नमी रह गई 

जिंदगानी की महफ़िल सजी तो मगर 

जिंदगी में तुम्हारी कमी रह गई 


मुझको लंबे सफर में यहाँ जो मिला 

साथ तुम ही रहे उनसे था फासला 

राह जिस पर कभी साथ गुजरे थे हम 

आँखें उस राह को ताकती रह गईं 

जिंदगानी की महफ़िल सजी तो मगर 

जिंदगी में तुम्हारी कमी रह गई 


घूमते घूमते खेत के मेड़ पर 

शाम गंगा किनारे किसी पेड़ पर 

एक होने की जो हमने बाँधी कभी

गाँठ वो उस जगह पर बँधी रह गई

जिंदगानी की महफ़िल सजी तो मगर 

जिंदगी में तुम्हारी कमी रह गई 


लोक मरजाद में गैर को चुन लिया 

जो तुम्हारा था उससे किनारा किया 

तुम गुजारी पिया संग हँस खेल कर

और हिस्से मेरी बेबसी रह गई 

जिंदगानी की महफ़िल सजी तो मगर 

जिंदगी में तुम्हारी कमी रह गई 


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