2122 2122
पत्थरों पर चल रहा हूँ
रास्तों को छल रहा हूँ 1
लग रहा हूँ आज मीठा
सब्र का मैं फल रहा हूँ 2
कर दिया उनको पवित्तर
यार गंगा जल रहा हूँ 3
अब नहीं ख्वाहिश किसी की
हाँ कभी बेकल रहा हूँ 4
आज इतनी गाड़ियाँ है
मैं कभी पैदल रहा हूँ 5
याद आऊँ, मुस्कुरा दो
वह तुम्हारा कल रहा हूँ 6
मैं डुबोया हूँ खुद ही को
स्वयं का दलदल रहा हूँ 7
चल रहा हूँ चाल अपनी
दुश्मनों को खल रहा हूँ 8
कर रहे परदा मुझी से
वो कि जिनका कल रहा हूँ 9
योगचारी हूँ, कभी पर
हुस्न पर पागल रहा हूँ 10
हो गया खुद बेसहारा
जो कभी संबल रहा हूँ 11
आशीष यादव
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