एक बढ़िया सी नाव समंदर में है पर पतवार नहीं है
मेरी ही छुट्टी पर मेरा रत्ती भर अधिकार नहीं है
साहब जी की संडे, GH को ऑफिस की बंदी है
तुम क्या जानो, अपनी खातिर हफ्ते में इतवार नहीं है
हम छुट्टी मांगें तो साहब धमकी देकर कहते हैं
छुट्टी वैलफेयर है सुन लो, यह कोई अधिकार नहीं है
उनकी चाहत, चौबीस घंटे उनको लोग सलामी ठोकें
लेकिन उनका इसके लायक बिल्कुल भी व्यवहार नहीं है
सबके खातिर ईद दिवाली होली क्रिसमस कितने हैं
एक हम हैं कि अपने खातिर कौई भी त्यौहार नहीं है
अपना घर है, घर में बीबी बच्चे हैं, मां बापू हैं
लेकिन सच पूछो तो अपना कोई भी घर बार नहीं है
आशीष यादव
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें